दोस्ती

बात जनवरी 2015 की है. मैं दिल्ली से सूरत आ रहा था. मैं अपना सफर राजधानी ट्रेन में कर रहा था. ट्रेन में लडक़ों का एक समूह बैठा था जो दिल्ली आईआईटी के पूर्व छात्र थे और अब आईआईएम अहमदाबाद में पढ़ रहे थे. आसपास के सभी लोग उनकी बातें ध्यान से सुन रहे थे. बड़े गंभीर विषयों देश की आंतरिक स्थिति, सामाजिक, राजनीतिक विषयों पर चर्चा कर रहे थे. तकरीबन चार घंटे के सफर के बाद मुझे टॉयलेट का प्रयोïग करने की जरूरत लगी जिस पर मैं उठ कर वहां गया. मैंने देखा उन्हीं छात्रों में से कुछ वहां खड़े हुए हैं हमें लगा यहां भीड़ है. मैं वापस अपनी सीट पर आ गया. थोड़ी देर पश्चात मैं पुन: वापस वहां गयाï. इस बार भी वे सभी वहीं खड़े थे. मुझे कुछ वहां अजीब सा लगा मैं ने ध्यान से देखा वे सब मिलकर ट्रेन के टॉयलेट के दरवाजे पर कुछ खुरच रहे थे.

मैंने ध्यान से देखा वहां लिखा हुआ था “रूकी हुई ट्रेन में शौचालय का प्रयोग ना करें”. वे सभी मिलकर उस न शब्द को खुरच रहे थे. अंत में उन्होंने उसे खुरच लिया अब वह वाक्य था “रूकी हुई ट्रेन में शौचालय का प्रयोग करें”. जब मैंने उन्हें ये करने के लिए डांटा तो वे बोले ” क्या, अंकल क्यों गुस्सा करते हैं. हम तो जस्ट फन कर रहे थे”. कहकर वे मेरी बात को हवा में उड़ाकर चल दिए. और मैं देख रहा था देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित संस्थानों से शिक्षित विद्यार्थियों को, जो देश की नीतिगत बड़ी बड़ी बातें कर रहे थे और सोच रहा था ये छोटी सी बात सही संस्कार नहीं सीख सके हैं.- भरत त्रिपाठी

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बात मेंरी शादी से पहले की है हम भाई बहन में अक्सर झगड़ा होता रहता था. उन दिनों बच्चों को पॉकेटमनी देने का चलन नहीं था. घर की रद्दी बिकने पर मिले रूपए हम भाई बहनों को दे दिए जाते थे.

उन रूपयों से हम अपने लिए पैन या ऐसी ही कुछ जरूरत का सामान खरीदते थे. एक बार मैंने देखा भाई मां से पैन खरीदने के लिए पैसे मांग रहा था. मैंने गुस्से में कहा तुम्हारे पैसे कहां हैं. पता नहीं कहां उल्टी सीधी जगह खर्च कर देता है. ये सुनकर भैया उदास हो गया. फिर बोला जीजी मैंने अपने पैसों से आपको जन्मदिन पर आपकी मनपसंद कैसेट उपहार में दी थी. मैं कहीं भी फालतू पैसे नहीं खर्च करता हूं. ये सुनकर मेरे मन में भैया के लिए अपार स्नेह जाग उठा. -रुचि मित्तल

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बात मेरे बचपन की है. मैं छठी कक्षा की छात्रा थी . मेरे साथ दो लड़कियां पढ़ती थीं जो बात बात पर सभी को पागल कहतीï थीं. उनका हर वाक्य पागल शब्द से शुरू होता था ये मुझे बिल्कुल पसंद नहीं था. मैंने उन्हें कई बार कहा था मुझसे इस तरह नहीं बोला करें, पर उनकी आदत छूटती ही नहीं थी. फिर मैंने उन्हें सबक सिखाने की सोची. एक दिन जैसे ही उन्होंने मुझे पागल कहा मैंने चीखकर कहा- हां मैं पागल हूं और मैंने जोर जोर से उनके बाल खींचने शुरू कर दिए. ये देखकर वो डर गईं और आईंदा उन्होंने पागल बोलना बंद कर दिया. आज भी हम लोग आपस में मिलते हैं तो इस घटना को याद करके खूब हंसते हैं. श्वेता गुप्ता

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