दोस्ती

सफर दोस्ती का यूँ ही चलता रहे,
सूरज चाहे हर शाम ढलता रहा,
ना ढलेगी अपनी दोस्ती की सुबह,
चाहे हर रिश्ता बदलता रहे.

बात उन दिनों की है जब मैं मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही थी. मुझे इसकी तैयारी करते हुए दो वर्ष हो गए थे. उन्हीं दिनों मेरी सहेली किरण ने भी मेडिकल की तैयारी की. उसने मेडिकल प्रवेश परीक्षा देने का निर्णय परीक्षा से तीन माह पूर्व ही लिया था. परीक्षा परिणाम आने पर हम दोनों का ही चयन नहीं हुआ था. मैं उसके घर गई देखाï वह जोर जोर से रो रही थी. मुझे देखते ही बोली- रजनी, मैंने इतनी मेहनत और तैयारी की थी, फिर भी मेरा चयन नहीं हुआ. ये सुनते ही मुझे जोर की हंसी आ गई, वो मेरा मुंह देखने लगी. मैंने कहा – अगर तूने तैयारी और मेहनत की थी तो मैं क्या कर रही थी? ये सुनते ही वो भी हंसने लगी.
रजनी बारेठ, जयपुर.
********************************************************************************
बात उन दिनों की है जब मेरे विवाह को कुछ ही महीने हुए थे और हम राजस्थान से सूरत नए नए रहने आए थे.ï मेरे पति विवाह से पूर्व अपने भाई के साथ रहते थे. दोनों भाईयों का विवाह एक साथ हुआ थाï. मैं विवाह के पश्चात ससुराल और मायके में रही इस दौरान मेरी जेठानी सूरत अपने घर में रहने लगी थीं. जब मैं पहली बार अपने पति के साथ सूरत आई तो जेठानी ने हमें स्पष्ट तौर अपने साथ रखने को मना कर दिया. उस समय रात्रि के एक बज रहे थे. प्रात: नौ बजे हम घर से बाहर निकलकर आ गए . हम पति पत्नी के पास सामान के नाम पर सिर्फ एक बैग था. मेरे पति मुझे लेकर अपने एक मित्र के घर आ गए. उनके मित्र अमित ने न केवल खुले दिल से हमारा स्वागत किया वरन परेशानी से भरे उस दौर में हमें अपने घर में रहने को कहा. लगभग बीस दिनों तक हम उनके साथ रहेï. इस दौरान उन्होंने हमें एक पल को भी असहज महसूस नहीं होने दिया. आज हम पूर्ण रूप सेï बेहतर स्थिति में हैं. अपना घर व्यवसाय है. परंतु अमित भैया के द्वारा निभाया गया दोस्ती का रिश्ता हमारी स्मृति में ज्यूं का त्यूं सुरक्षित है. दोस्ती निभाने का ये अनमोल उदाहरण है.
अनामिका, सूरत.
******************************************************************************
बात सन २०१० की जनवरी की सर्दियों की है. मुझे ग्वालियर से सूरत आना था. कोहरे की वजह से ट्रेनें देरी से चल रही थीं. मेरी ट्रेन रात आठ बजे की थी जो कि ग्वालियर से सीधी सूरत आती थी. वातानुकूलित तृतीय श्रेणी में मेरा आरक्षण था. मैं रेलवे स्टेशन पहुंच गई थी परंतु ट्रेन चार घंटे देरी से चल रही थी. आखिरकार रात तीन बजे ट्रेन स्टेशन पर आई. ट्रेन में जब मैं चढ़ी तो अपनी बर्थ पर कंबल ढूंढऩे लगी तभी साइड की बर्थ की मेरी आयु की लडक़ी ने मुझे कहा कि शायद कंबल कम हैं. आप चाहें तो मेरा कंबल ले लें, मेरे पास घर का एक कंबल और है. मैंने उनसे धन्यवाद करते हुए उनका कंबल ले लिया. सुबह नींद खुली तो उनसे बातचीत शुरू की. उनका नाम सोनल था और वे बड़ौदा जा रहीं थीं. उन्होनें मुझे अपनी सीट पर बैठने को कहा फिर बस पूरे रास्ते हम दोनों बातचीत करते रहे. जो भी स्टेशन आता हम एक ही प्लेट लेते और मिलजुल कर खाते. सफर कब खत्म हो गया पता ही नहीं लगा. आधी रात को बड़ौदा आया. मैंने सोनल से उसका नंबर ले लिया था. सूरत आने के बाद हम एक दूसरे के संपर्क में रहे. परंतु एक बार मेरा फोन समुद्र के पानी में गिर जाने के पश्चात मुझसे उनका नंबर खो गया. हम आज संपर्क में नहीं हैं परतुं मुझे अपनी वो रेल सहयात्री सखी अक्सर याद आती है.
बुलबुल, सूरत.
********************************************************************************
बात तब की है जब हम कॉलेज में पढ़ा करते थे. मैं थोड़ा शब्दों के उच्चारण में कहीं कहीं गड़बड़ाता हूं जैसे कि र को य बोलता हूं. मैं विज्ञान वर्ग से स्नातक कर रहा था और सुबोध महाविद्यालय जयपुर का छात्र था. मैं गणित के एक पेपर की प्राइवेट टयूशन जाता था. वहां एक दिन टीचर ने एक सवाल पूछा जिसका उत्तर था जीरो. मैंने कहा सर जियो. टीचर बोले, मैं तो जी रहा हूं पर इसका उत्तर क्या होगा? मैंने फिर से कहा- जियो. सभी विद्यार्थी हंस रहे थे तभी एक छात्र बोला, सर इसे बोलने में थोड़ी दिक्कत है इसका अर्थ जीरो है. सर समझ गए और आगे पढ़ाने लगे. मैंने उस छात्र की तरफ देखा और आंखों से उसे धन्यवाद दिया कि उसने मुझे इस अटपटी स्थिति से उबार लिया था. क्लॉस खत्म होने पर बाहर आने के बाद मैंने उसका नाम पूछा. उसने कहा दिवाकर. मैंने कहा श्रवण और दोस्ती के लिए हाथ उसकी ओर बढ़ाया. तब से आज तक हम दोनों बहुïत ही गहरे दोस्त बने हुए हैं.
श्रवण विजयवर्गीय, जयपुर.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *