दोस्ती जो दिल को छू गई


कहीं दूर जब दिन ढल जाए सांझ की दुल्हन बदन चुराए..

राजेश खन्ना के ऊपर फिल्माया गया ये गीत सभी को अपने खूबसूरत शब्दों की वजह से गुनगुनाने पर मजबूर कर देता है.

इस गीत के गीतकार हैं मशहूर गीतकार योगेश. मूल रूप से लखनऊ के रहने वाले योगेश का जन्म 1943 में हुआ था. वे बचपन से ही कविताओं को लिखने में बेहद रुचि रखते थे. उनके दो ही साथी थे पहली कविता और दूसरे उनके दोस्त सत्येंन्द्र.

योगेशजी ने जब मुंबई जाने का और फिल्मों में गीत लिखकर अपना भाग्य आजमाने का फैसला किया तब सत्येंद्र जी ने उन्हें मुंबई न जाने की सलाह दी परंतु योगेशजी के न मानने पर, वे भी उनके साथ मुंबई आ गए. मुंबई जाने से पहले सत्येन्द्रजी ने योगेशजी के सामने शर्त रखी कि तुम मुंबई इसी शर्त पर जा सकते हो कि तुम सिर्फ कविताएं लिखोगे और अपना काम ढूंढ़ोगे, जबकि रहने और जीवन के अन्य खर्चों की व्यवस्था मैं करूंगा.

मुंबई आने पर योगेशजी का मन नहीं माना और उन्होंने एक कारखाने में कार्य शुरू कर दिया. सत्येन्द्र जी को पता लगने पर वे उनके पीछे गए और उन्होंने योगेशजी को मैनेजर से कहकर बाहर बुलवाया और कार्य करने को मना किया. इस बीच योगेशजी ने कुछ फिल्मों के लिए गीत लिखे पर उन्हें पहचान और सफलता दोनों ही सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में सजी आनंद फिल्म के गीतों से मिली. इसके पश्चात वे सफलता की सीढ़ियां चढ़ते गए. रजनीगंधा, बातों बातों में के गीतों की सफलता से सत्येन्द्र जी और योगेशजी की दोस्ती के बीच में कोई अन्तर नहीं आया.

सत्येंन्द्र जी की मृत्यु एक दुर्घटना के कारण हुई. जब वे अस्पताल में जिंदगी और मृत्यु के बीच झूल रहे थे. तब उनकी आखिरी सांसे योगेशजी का इंतजार कर रहीं थीं. योगेशजी के वहां आने के उपरांत कुछ समय तक दोनों मित्रों की दृष्टि आपस में मिली और सत्येंद्र जी ने इसी अवस्था में अंतिम सांस ली.

सौजन्य

बकुल टेलर.

मेरे बचपन का मित्र चेतन देसाई आज भी मेरा सबसे अच्छा मित्र है. बात तब की है जब हम ग्यारवहीं कक्षा के विद्यार्थी थे और सूरत के गोपीपुरा इलाके में रहते थे.


मैं आर्थिकरूप से कमजोर था. मेरे पिता की मृत्यु हो चुकी थी. इस कारण परिवार की सारी जिम्मेदारियां मेरे ऊपर थीं.कमजोर आर्थिक स्थिति के बावजूद मैं काफी स्वाभिमानी बच्चा था और किसी से किसी भी प्रकार की आर्थिक सहायता लेना मुझे मंजूर नहीं था. 

चेतन मेरा ऐसा मित्र था जिससे मैं अपने मन की सभी बातें साझा किया करता था.

चेतन बचपन से ही अमिताभ बच्चन का बड़ा प्रशंसक था इसी समय अमिताभ की हिट फिल्म शोले आई और चेतन ने मुझसे इसे अपने साथ देखने जाने के लिए कहा परंतु मैने आर्थिक अभाव की वजह से इंकार करते हुए कहा जब मैं स्वयं टिकट खरीदने के पैसे एकत्र कर लूंगा तभी हम ये फिल्म देखने जाएंगे. उस समय चेतन का पोरबंदर जाना हुआ वहां कंचे 10 पैसे में एक मिलते थे और सूरत में 40 पैसे में मिलते थे, यह देखकर चेतन 100 कंचे खरीदकर लाया और खेल खेल में जानबूझकर मुझसे सभी कंचे हार गया (जबकि वह कंचे बहुत ज्यादा अच्छा खेलता था) जिससे कि वह कंचे बेचकर मैं फिल्म देखने के पैसे जमा कर सकूं और मेरे स्वाभिमान को चोट भी ना पहुंचे. उस समय मुझे यह समझ नहीं आया परंतु वयस्क होने तक मुझे यह समझ में आ गया कि उस दिन चेतन सारे कंचे मुझसे कैसे हार गया.

वर्षों के उपरांत आज मैं गुजरात मित्र में उपसंपादक के पद पर कार्यरत हूं इसलिए तीन वर्ष पूर्व अमिताभ बच्चन के सूरत आगमन पर मेरे मित्र चेतन का मुझ पर फोन आया और उसने मुझसे अमिताभ से मिल सकने की बात की. मैने काफी कोशिश की कि कुछ इंतजाम हो सके, ना होने पर मैनें उसके लिए टिकट खरीदी और उसकी अमिताभ के साथ तस्वीरें खिंच सकें इसका इंतजाम किया. इसके पश्चात चेतन ने जब मुझे धन्यवाद देना चाहा और टिकट के पैसे भी देने चाहे. तब मैने उसे बचपन के उन कंचों और हम दोनों की नि:स्वार्थ दोस्ती का स्मरण कराया.आज भी हम दोनों बेहतर मित्र हैं.

प्रस्तुत स्तंभ के लिए अपने अनुभव, आपकी तस्वीर के साथ हमें इस पते पर भेजें…महक संपादकीय विभाग, गुरूकृपा बिल्डिंग, बेकामेंट,बैंक ऑफ बड़ौदा के पास, रांदेर रोड, सूरत. गुजरात एसएमएस से अपनी राय 7574860097 पर भेजें.

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