दोस्ती जो दिल को छू गई.

बात उन दिनों की है जब मैं छठी कक्षा का विद्यार्थी था. मेरे पिताजी सरकारी चिकित्सक थे और उनका गांव से जयपुर में स्थानांतरण हुआ था. जयपुर की चमक दमक मुझे आकर्षित करती थी. मेरा एडमिशन घर से थोड़ा दूर एक अच्छे स्कूल में कराया गया. उस समय आज की तरह प्रत्येक स्कूल की बस नहीं हुआ करती थी. सामान्यत: विद्यार्थी साइकिल से ही स्कूल आते जाते थे.मुझे भी मेरे पापा ने स्कूल आने जाने के लिए साइकिल दिलवाई. स्कूल के प्रथम दिन ही मेरी एक विद्यार्थी से मित्रता हो गई जिसका नाम नरेन्द्र सिंह शेखावत था. वह पैदल ही स्कूल से घर आता जाता था लेकिन वह बड़ा स्वाभिमानी था. मैंने उसे मेरी साइकिल पर साथ चलने के लिए कहा तो उसने स्पष्ट मना कर दिया. जब मैंने ये बात अपनी मां को बताई तो मां ने मुझे एक उपाय सुझाया और मैंने अगले दिन उससे कहा यार, नरेन्द्र मैं साइकिल चलाने में थक जाता हूँ तू मुझे साइकिल पर बैठाकर घर छोड़ दे. मेरी ये बात वो मान गया और छह सात किलोमीटर पैदल चलने की बजाय मेरे साथ साइकिल पर गया, मेरे घर से कुछ ही दूर उसका घर था. मैंने पहले उसके घर उसे छोड़ा फिर मैं अपने घर आया. इस प्रकार रोज का सिलसिला बन गया. हम दोनों मित्र साथ में मेरी साइकिल पर जाते. साइकिल वो चलाता. धीरे धीरे हमारी मित्रता गहरी होती चली गई आज भी मेरा वो बहुत ही गहराï दोस्त है. वो जयपुर में रहता है और मैं दिल्ली में. परंतु इन दूरियों से हमारी दोस्ती कोई फर्क नहीं आया है.- दिवाकर गुप्ता

मेरा मायका जयपुर में है. बात 1998 की मेरे विवाह के समय की है. हमलोग विवाह के लिए दिल्ली जाने वाले थे. इसलिए पापा ने निर्णय लिया कि एक बड़ा कार्यक्रम जयपुर में भी करेंगे. घर में विचार विमर्श के उपरांत महिला संगीत को जयपुर में करने का निर्णय लिया गया. उस समय महिला संगीत आज की तरह नहीं होता था वरन सभी आमंत्रित महिलाएं और लड़कियां गाने गातीं और उन्हीं पर नाचती थीं. थोड़ा कुछ स्वल्पाहार जैसा भी होता था.

मेरी इच्छा थी कि ये कार्यक्रम थोड़ा आधुनिक ढंग से हो पापा इस बात के लिए तो तैयार हो गए कि कार्यक्रम घर की जगह किसी सामुदायिक भवन में किया जाएगा और बाद में सभी को डिनर भी दिया जाएगा लेकिन वे कार्यक्रम के संचालन के लिए एंकर बुलाने को तैयार नहीं थे. इससे मेरे साथ साथ मेरीï सभी बहनों व सहेलियों का मूड खराब हो रहा था. तभी मेरी एक सहेली किरन जो कि उस समय आकाशवाणी मे काम करती थी ने कहा संचालन की जिम्मेदारी वो संभालेगी. अब समस्या थी कि संचालक की. इस पर उसने मेरे ही एक और दोस्त निमेष से बात की और उन दोनों ने अपना समय और कई दिन लगाकर इसकी तैयारी और अभ्यास किया. सभी नाचने वालों के साथ भी समन्वय किया और महिला संगीत को यादगार बना दिया. आज भी वो मेरी बहुत ही अच्छी सहेली हैं. उसकी दोस्ती के यूं तो कई पल यादगार हैं परंतु उनमें से एक ये ही है जो हमेशा याद दिलाता है कि सच्चे और अच्छे दोस्त न केवल जरूरत में काम आते हैं वरन एक दूसरे की भावनाओं और इच्छाओं को समझकर उन्हें पूरी करने में हमारी मदद करते हैं.- निधि सक्सेना


बात उस समय की है जब हमारी नई नई शादी हुई थी. हम चार मंजिला इमारत में किराए पर एक फ्लैट में रहते थे. कुछ समय पश्चात हमारे पड़ोसी फ्लैट में भी एक पति पत्नी रहने आ गए उनका विवाह हुए भी कुछ ही माह हुए थे. हम दोनों परिवारों में जल्दी ही मित्रता हो गई. हमारी आगे के हॉल की एक दीवार एक ही थी और फ्लैट की बॉलकनी भी सटी हुई थी. हम दोनों महिलाएं बहुत ही अच्छी सखी बन गई. हम प्रत्येक कार्य का कार्यक्रम साथ में बनाते. सुबह जल्दी जल्दी घर के कार्य खत्म करके बाजार जाना, सब्जी लाना सभी साथ में करते. यहां तक कि खाने में एक परिवार चपातियां बनाता और दूसरा सब्जी और फिर दोनों मिलकर साथ में खाते. उन्हीं दिनों टीवी शो कौन बनेगा करोड़पति स्टार प्लस पर प्रारंभ हुआ था. उसे भी साथ में देखते या एक दूसरे की बॉलकनी से उसका उत्तर पूछते. बड़े ही प्यारे दिन थे वो आज भी उन्हें याद करके चेहरे पर बरबस ही मुस्कान आ जाती है. आज भी वो और मैं बहुत ही अच्छी सहेलियां हैं.- वंदना भट्ट

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