देवदास रूपहले पर्दे पर प्रेम की अनवरत दास्तान

बंग्ला भाषा के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की लिखी प्रेम की अनोखी दास्तान ‘देवदास’ सिने जगत ने एक बार नहीं तीन बार रूपहले पर्दे पर उतारी है. सिनेमा के ऐतिहासिक युग से लेकर आधुनिकता, तकनीकी के वर्तमान युग तक इस कहानी को हर बार नए अंदाज में दर्शकों के लिए लाया गया. प्रत्येक बार देवदास को दर्शकों का भरपूर साथ मिला. प्रत्येक काल की देवदास अपनी मूल कहानी के साथ तत्कालीन देश काल की भव्यता और स्थितियों के साथ प्रदर्शित की गई. बचपन के साथ की, उस वय के सुख दुख को दो साथियों में साझा करती, ये प्रेमकहानी दिल से शुरू होकर दिल पर ही खत्म कर होती है. एक असफल व्यक्ति की एक बचपन की सखी की एक युवा पलों के साथी की ये प्रेमकहानी हर युग में युवा दर्शकों को लुभाती रही है.

कहानी में तत्कालीन बंगाली समाज की परिस्थितियां, वर्गभेद, ब्रिटिश समाज का भारतीय उच्च कुलों पर प्रभाव, समाज का संक्रमण काल, जमींदारी की स्थितियां, उनके वैभव, उनका समाज में प्रभाव और अंत में उनका समय के साथ दुर्बल होने का चित्रण, तत्कालीन सामाजिक, जमींदारी व्यवस्था का जीवंत चित्र प्रस्तुत करती है. हिन्दी सिने जगत में अभी तक ये फिल्म तीन बार बनाई जा चुकी है लेकिन 1928 से लेकर 2013 तक इसे 13 अन्य भाषाओं में भी बनाया जा चुका है.

अनसुलझी, हृदय तक पहुंचकर दस्तक देने वाली इस फिल्म को हिन्दी सिने जगत के लिए सर्वप्रथम बनाया था बंगाली बाबू कहे जाने वाले निर्देशक पी.सी. बरूआ ने.

फिल्म में देवदास के किरदार को निभाया था तत्कालीन सुप्रसिद्ध कलाकार कुंदनलाल सहगल ने उनके साथ पारो के किरदार में थी जमुना बरूआ (जोकि पी सी बरूआ की पत्नी थीं) ने जबकि चंद्रमुखी के किरदार को निभाया था उस समय की मशहूर कर्नाटकी शास्त्रीय गायिका और नृत्यांगना टी. आर. राजकुमारी ने. श्वेत श्याम रंग की ये फिल्म आजादी के संग्राम के माहौल में आई प्रेम कहानी थी.

इस फिल्म के निर्माण के समय बरूआ के सहयोगी रहे विमल रॉय को ये कहानी इतनी अधिक पसंद आई कि 1955 में इस फिल्म को उन्होंने तत्कालीन कलाकारों के साथ पुन: बनाया. फिल्म के मुख्य किरदार देवदास को हिन्दी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता और ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार यानि की युसुफ साहब ने निभाया. फिल्म में पारो की किरदार में था नया चेहरा बंगाली कला, मासूम अदाओं और खूबसूरत चेहने की मालिक सुचित्रा सेन जबकि चंद्रमुखी के किरदार में थी भरतनाटयम की कुशल नृत्यंगना वैजयंतीमाला. इस फिल्म के लेखक नबेंदु घोष ने “फिल्मी दुनिया” पत्रिका को दिए अपने एक साक्षात्कार में बताया था एक दिन शूटिंग के दौरान युसुफ साहब बड़े हैरान परेशान लग रहे थे.अकेले अकेले से घूम रहे थे. नबेन्दु घोष उनके पास गए और पूछा ‘‘युसुफ भाई क्या बात है? आप बहुत परेशान लग रहे हैं?’’

दिलीप कुमार बोले, ‘‘वे तीनों मेरे कंधों पर बैठे हुए हैं.’’

नबेंदु ने आश्चर्यचकित होकर पूछा, ‘‘कौन तीनों?’’

और जबाव मिला, ‘‘शरतचंद्र, बरूआजी और कुंदनलाल सहगल.’’

इसी वजह से अत्यधिक परिश्रम और कलात्मकता से बुनी गई इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए रिकार्ड बनाए और इसकी ऊंचाईयों सर्वकालिक बन गई. वर्ष 2005 में इंडियाटाइम्स की सर्वश्रेष्ठ पच्चीस हिन्दी सिने जगत की फिल्मों की सूची में इसने अपना स्थान बनाया. सचिनदेव बर्मन के मधुर गीत संगीत से सजी इस फिल्म के गीत लिखे थे ख्यातिनाम गीतकार साहिर लुधियानवी ने.

जिसे तू कबूल कर ले वो सदा कहां से लाऊं, तेरे दिल को जो लुभा ले वो अदा कहां से लाऊं, जिसे तू कूबूल कर ले….. लतामंगेशकर के गाए इस गीत में गजब की दर्द भरी सदा है. फिल्म का एकमात्र भजन ‘आन मिलो श्याम सांवरे,’ ‘वृज में अकेली राधे खोई खोई फिरे’ गीता दत्त और मन्ना डे की शास्त्रीय आवाजों से बेहद रसप्रद बन पड़ा है.

वो ना आएंगे पलट कर दिलीपकुमार और वैजयंतीमाला पर फिल्माया गया मुबारक बेगम की आवाज के इस गीत ने फिल्म की सफलता में एक बड़ा रोल निभाया. फिल्म का गीत संगीत फिल्म के सर्वाधिक मजबूत पक्षों में से एक था. अब बात करते हैं 21 वीं सदी की शुरूआत में आई संजयलीला भंसाली द्वारा निर्मित देवदास की.

अपने विशाल, भव्य सैट्स, महंगे वस्त्रों, भारी भरकम आभूषणों और बड़े सितारों से सजी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड धाराशायी कर दिए.

एक बड़ी सफलता के लिए तरस रही माधुरी दीक्षित के कैरियर की यादगार फिल्म बनी इस फिल्म में माधुरी ने चंद्रमुखी का किरदार निभाया जबकि बालपन से युवा होने तक की इस पवित्र प्रेमकहानी के किरदार देव और पारो को निभाया शाहरूख खान और विश्वसुंदरी ऐश्वर्या रॉय ने.

इस फिल्म की सफलता से पूरा हिन्दी सिने उद्योग चकाचौंध रह गया. इस फिल्म में सौ वर्ष से ज्यादा पुरानी शरतचंद्र के देवदास के मूल कथानक में मामूली से कुछ परिवर्तन किए गए. इसमें जमींदारों के वैभव को पूरी भव्यता के साथ, बंगाली रीतिरिवाजों, परंपराओं को पूरी कल्पनात्मकता के साथ परोसा गया. भंसाली अपनी फिल्मों में कलात्मकता के अनूठे प्रयोगों के लिए जाने जाते हैं. फिल्म के मशहूर नृत्य “डोला रे, डोला रे मन डोला डोला दिल डोला” गीत पर नृत्य का फिल्मांकन पूरी फिल्म ही नहीं कहानी का नया प्रयोग था. शरत के मूल उपन्यास में पारो और चंद्रमुखी कभी मिलते ही नहीं हैं.

ढेरों अवार्ड जीतने वाली इस फिल्म के शाहरूख खान ने बेमिसाल अभिनय किया है. टूटे दिल के प्रेमी के किरदार को जीवंत किया और तकनीकी के साथ अदभुत कला का संयोजन पेश किया. शाहरूख के मित्र की भूमिका में जैकी श्रॉफ ने भी दर्शकों पर अपने अभिनय की गहरी छाप छोड़ी. काफी समय बाद नज़र आए विजेंद्र घाटगे ने छोटे से रोल में जान डाल दी. फिल्म का गीत संगीत फिल्म का मजबूत ओर खूबसूरत पहलू बनकर दर्शकों के सामने आया.

नदीम परमार.

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