दादा–दादी , नाना–नानी के बारे में आज की पीढ़ी से कुछ विचार

दादा–दादी , नाना–नानी
दादा–दादी , नाना–नानी


काफी समय पश्चात बाजार के लिए निकलना हुआ रास्ते में गर्ग साहब का घर था सोचा चलो मिलता हुआ चलता हूँ. गर्ग साहब घर पर ही मिल गए. बातचीत के दौरान नई पीढ़ी की बात चल निकली. गर्ग साहब रौबदार आवाज में बोले “ये आजकल के बच्चे किसी से नमस्ते तक नहीं करते हैं”. उनकी बात सुनकर मुझे याद आया, गर्ग साहब भी कभी किसी से आगे बढ़कर नमस्ते करना या उसके हाल चाल पूछना अपनी तौहीन ही समझते थे. मैंने कुछ मुस्कुराकर कहा “बच्चे हैं, सीख जायँगे और फिर जैसा हम उन्हें देखने और सीखने का माहौल देंगे वैसा ही तो वे करेंगे” बातचीत में मैंने देखा वे हर बात में दूसरे की कमी ही निकाल रहे थे तभी मैंने सोचा क्यूँ ना अखबारी दुनिया से हटकर पिछली पीढ़ी के बुज़ुर्गों दादा–दादी , नाना–नानी के बारे में आज की पीढ़ी से भी कुछ विचार जाने जाएँ. यहाँ मैं बता दूँ इसमें लिखे गए नामों के अलावा बच्चों के अपने दादा–दादी , नाना–नानी के प्रति विचार , सभी कुछ पूरी तरह सच है .


सबसे पहले 21 वर्षीय अनीता  कहती है “हमें हमारी दादी बिल्कुल भी पसंद नहीं हैं जब उन्हें काम होता है तो वो हमसे बात करती हैं नहीं तो बात भी नहीं करती हैं उन्हें कभी कुछ रसोई में बनाते हुए नहीं देखा है हम उनसे क्या सीखें ? हमेशा गाली देकर बात करती हैं. मेरी माँ को पसंद नहीं करती हैं  हमें घर से निकाल दिया लेकिन उनकी बीमारी में मेरी माँ ही उनकी सेवा करती हैं . हमें वो बिलकुल पसंद नहीं हैं हमारे दादा हमसे बैठकर  बात करते थे लेकिन वे शराब पीते थे और गाली देते थे. उन लोगों में ऐसा कुछ नहीं है जो उनसे सीखा जाता.”  

12 वर्षीय स्मिता अपने दादाजी के बारे में पूछने पर बोलती है “उनसे सोना सीख सकते हैं. उन्हें कोई बीमारी नहीं है लेकिन वे दिनभर लेटे रहते हैं पूरे दिन ड्राइंगरूम को बैडरूम बना कर रखते हैं यहां तक की कोई हमारे घर आता है तो भी वे लेटे ही रहते हैं वे या दादी घर के किसी काम में माँ की कोई मदद  नहीं करते हैं लेकिन उन्हें कपड़े हमेशा नए चाहिए साथ ही घर में वे सामान बहुत बिखेरते हैं पूरे दिन माँ सामान उठाती रहती हैं उनकी वजह से पापा भी घर का कोई काम नहीं करते हैं.” 

10 वर्षीय अनंत से बात करने पर वो बोला “मेरे कई दोस्तों के दादाजी उनके साथ बाजार जाते हैं उनके स्कूल के प्रोजेक्ट करने में हैल्प करते हैं उनके दोस्तों के साथ मिक्स भी होते हैं लेकिन मेरे दादाजी पूरे दिन चुपचाप मुंह फुला कर बैठे रहते हैं उन्हें हमेशा मुझसे मेरी जीजी से और मां से शिकायत रहती है वे सिर्फ पापा से ही बात करते हैं साथ ही कभी कोई काम भी नहीं करते  हैं किसी आने जाने वाले से बात तक ढंग से नहीं करते हैं सिर्फ उनके जाने के बाद उनकी हंसी उड़ाते हैं मेरी और मेरी जीजी की शिकायत पापा से करते रहते हैं लेकिन कभी हमसे बात तक नहीं करते हैं ना ही कभी उनसे कोई इंस्पिरेशन जैसी बात सीखने को मिलती है वे गुटका भी खाते हैं.” 

संदीप अपने दादी दादाजी के बारे में कोई बात करने को तैयार ही नहीं था बोला “वैसे तो वे दूसरे शहर में रहते हैं लेकिन जब भी वे आते हैं घर में झगड़े का माहौल रहता है यहां तक की उनके जाने के कई दिनों बाद तक ऐसे रहता है वे किसी काम में किसी की हैल्प नहीं करते हैं हमने कभी अपनी दादी के हाथ की बनी कोई डिश नहीं खाई है.” 

 आर्यंश 15 वर्षीय अपने दादा से बहुत इंस्पायर है वह कहता है “मेरे दादाजी हमेशा कुछ न कुछ कार्य में व्यस्त रहते हैं घर में किसी का भी जन्मदिन हो उसके लिए सबसे ज्यादा उत्साहित वही रहते हैं उनका सभी के साथ व्यवहार बहुत मिलनसार और  विनम्र होता है.मुझे उनके साथ रहना बहुत अच्छा लगता है.”

“जगदीश के दादाजी कितने भी बीमार हों उन्हें बच्चों के साथ खेलने में बहुत मज़ा आता है वे घर का सामान लाना, उसे स्कूल बस से लाना , स्पोर्ट्स कोचिंग लाना ले जाना सभी काम करते हैं उसकी दादी भी उसे अक्सर नई डिश बनाकर खिलातीं हैं वे उसके स्कूल के कार्यक्रमों में भी आती हैं उसके दादाजी उसे कहानियां भी सुनाते हैं और दादी घर में तरह तरह की चीज़ें बनातीं हैं.” जगदीश के अनुसार उसके दादा और दादी वर्ल्ड के बेस्ट दादा दादी हैं . 

साहिल अपने दादा दादी के बारे में कोई बात नहीं करना चाहता है कहता है “जब मेरी मम्मी अपने काम के सिलसिले में शहर से बाहर गईं और वे लोग उनके पास आये हुए थे मम्मी ने उन्हें रूकने को कहा लेकिन वे रुके नहीं वे अपने मतलब से आते हैं उन्हें सिर्फ पापा से मतलब होता है आज तक उन्होनें हमें कभी कोई गिफ्ट नहीं लाकर या अपने हाथों से बनाकर नहीं  दिया है”  

स्तुति याद करते हुए बोलती है “एक बार सूरत में बाढ़ आई हुई थी बाढ़ ख़त्म होने के बाद दूध बांटने वाले आये थे मेरा छोटा भाई हुआ था दादाजी नीचे गए तो पहले लाइन में ही नहीं लगे और फिर मुझे कहा कि तुम जाकर लाओ जबकि तब में चार वर्ष की थी. यहां तक की वे उस समय भी खाने पीने में एडजस्ट नहीं करते थे वे कभी भी किसी के साथ एडजस्ट नहीं करते हैं वे अत्यंत घमंडी इंसान हैं वे कभी हमें कोई कहानी या घटना नहीं बताते हैं लेकिन मेरे नानाजी हमेशा काम करते हैं कहानी सुनाते हैं नानी नई रेसिपी बना कर खिलाती है हमारे लिए हर मौके पर गिफ्ट लातें हैं हमसे हमारी पढाई और दोस्तों के बारे में बात करते हैं एक बार में बीमार पड़ गई तब नानाजी हमारे घर आये हुए थे वे काफी दूर पैदल जाकर मेरी दवाई लाये. वे बहुत मिलनसार हैं और कोई उनकी मदद करता है तो उसे धन्यवाद देते हैं जबकि मेरे दादाजी मदद लेकर हंसी उड़ाते हैं.”

इन सबके बीच में काव्य के अपने दादाजी को लेकर एक वाक्य का जवाब पहले आया “मेरे दादाजी जैसे किसी के दादाजी नहीं हो सकते हैं वे हमेशा एक्टिव रहते हैं वे हमेशा आगे बढ़कर दूसरों की मदद करते हैं यही बात मैं उनसे सीखना चाहता हूँ वे हमेशा सभी से अच्छी तरह बोलते हैं कभी किसी के काम में कोई कमी नहीं निकालते हैं गर्मियों के दिनों में वे प्याऊ बनवाते हैं और स्वयं भी दूसरों को पानी पिलाते हैं उन्हें व्यवस्थित और सजा संवरा घर बहुत पसंद है मेरे दादाजी का समाज में बहुत सम्मान है.” 

इसी बात पर प्रांशुल बोलता है “मेरी दादी बीमार रहती है लेकिन फिर भी मेरा बहुत ख्याल रखती है मेरे दादाजी खाना बहुत अच्छा बनाते हैं कभी कभी वे कुछ नई डिश भी बनाते हैं उनका बहुत बड़ा सर्कल है मेरे पापा बताते हैं कि मेरे एडमिशन में भी दादाजी के व्यवहार और उनकी छवि का बहुत बढ़ा योगदान था.”

व्योमा के अनुसार “वह हमेशा से अपनी दादी को पसंद करती है उसकी दादी घर को सजाकर रखती है और वे बहुत क्रिएटिव हैं डेकोरेशन से सम्बंधित सभी प्रतियोगिता में वह दादी की मदद से भाग लेती और जीतती भी है उसके मम्मी पापा दोनों ही बाहर काम करते हैं उनके पूरे घर की सार संभाल उसकी दादी ही करतीं हैं मम्मी बाहर के काम करने के लिए पूरी तरह फ्री रहती हैं.”

ये थे बच्चों के विचार उनके अपने दादा दादी और नाना नानी के प्रति. समाज में एक सोच व्यापक तरीके से छा गई है कि नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी दादा–दादी , नाना–नानी का सम्मान नहीं करती है इससे इतर नई पीढ़ी की द्रष्टि से समझने की कोई कोशिश नहीं करता है जरूरत है उन्हें दोष देने की जगह दादा दादी हों या नाना नानी वे अपनी भूमिका को समझें और निभाएं. यदि दादा–दादी , नाना–नानीछोटे छोटे बच्चों की भावनाओं को भी नहीं समझ सकते हैं तो फिर नई पीढ़ी को दोष देना व्यर्थ ही होगा. 

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