डॉ. मुकेश गाजीवाला

शहर के जानेमाने चिकित्सक डॉ. मुकेश गाजीवाला से हमने अपने स्तभं उड़ान के लिये बातचीत का समय मांगा तो उन्होंने सहज रूप से इसके लिये सहमति दे दी.
बात शुरू करने से पहले मुकेशजी ने एक गिलास पानी पिया और अपनी पुरानी यादों को सहेजते हुए बोले 1956 में सूरत में निम्न मध्यम वर्गीय परिवार में मेरा जन्म हुआ था. पिताजी की छोटी सी किराने की दुकान थी जिस से घर का खर्चा मुश्किल से चलता था. अपनी प्राथमिक शिक्षा नजदीक के सरकारी विद्यालय से पूरी की, माध्यमिक शिक्षा टी एन्ड टी. वी स्कूल से की आगे विज्ञान विषय की शिक्षा ग्रहण करने के लिये पी.टी सांइस कॉलेज में एडमिशन लिया. मेडिकल की शिक्षा ग्रहण करने के लिए उस दिशा में प्रयास प्रारंभ किया अंतत: इसमें सफलता हासिल की और जामनगर के मेडिकल कॉलेज में प्रवेश मिल गया.
जहाँ एक तरफ मेडिकल में प्रवेश की खुशी थी वहीं घर से दूर जाने का दुख. जामनगर पहुँचने पर शुरू में वहां मन नहीं लगा कुछ दिनों बाद उस शहर से भी प्यार हो गया. आर्थिक तंगी को पूरा करने के लिए ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया साथ ही कुछ और छोटे मोटे कार्य भी कर लेता था.
जामनगर के जे.के.वी.कॉलेज के दिनों को याद करके उनके चहेरे पे मुस्कान छा जाती है. वे बताते है उस कॉलेज ने हमें सिखाया कि अपने जीवन और व्यवसायिक सफलता के साथ प्रत्येक व्यक्ति की सामाजिक जिम्मेदारी भी होती है. जो उसे हर हालत में निभाना चाहिए.
उन दिनों हमारा एक मित्र दुर्घटना का शिकार हो गया था उसे अस्पताल ले जाने पर वहाँ उसके रक्त समूह का रक्त उपलब्ध नहीं था उस समय हमारे एक मित्र ने रक्त देकर (जो कि जरूरत वाले समूह का था) उसकी जान बचाई.
यह देखकर हम सभी दोस्तों ने कॉलेज प्रशासन के सहयोग से डीडीए नामक एक ब्लड बैंक प्रारंभ किया डीडीए की शुरूआत में रक्त दान करने वाले सबसे प्रथम व्यक्ति पी.के.बंसल जी हमारे डीन ने किया तब से लेकर आज तक वह ब्लड बैंक सैंकडों की जान बचा कर अपने कर्तव्य का पालन सफलता पूर्वक कर रहा है. उस समय हमने एक और नया कार्य किया. हमारे कॉलेज के पास ही एक स्टेशनरी की दुकान थी वह दुकानदार हमसे एडवांस में पैसे लेकर (जो कि कभी कभी वास्तविक मूल्य से ज्यादा होते थे) हमें पुस्तकें ला कर देता था. इससे सभी विद्यार्थी परेशान थे हम सभी विद्यार्थियों और शिक्षकों ने मिलकर कॉलेज कैम्पस में ही एक बुक स्टॉल शुरू की, यहाँ हम पब्लिशर से सीधे पुस्तकें खरीदते थे ये पुस्तकें विद्यार्थियों को सस्ती मिलती थीं वह बुक स्टॉल आज भी वहीं हैं. जामनगर में रहते हुए ऐसे कई नए कार्य हम सभी विद्यार्थियों, कॉलेज प्रशासन ने मिलकर शुरू किए.
1980 से सूरत में मैनें मेडिकल प्रैक्टिस शुरू की. मोरारजी देसाई के गुजरात में शासनकाल के दौरान करीबन 206 गांवो का सफर किया और अपने गुजरात को जाना समझा.
मुकेशजी अपने जीवन के सफर के बारे में काफी जानकारी दे चुके थे वे आज भी समाजसेवा के क्षेत्र में सक्रिय है और कई संस्थाओं से जुड़े हुए है. जिनमें रैडक्रॉस …… परीनबानू टी.वी हॉस्पिटल आदि हैं.

उनके परिवार में उनकी पत्नी और एक पुत्री हैं. पत्नी होम्योपौथी चिकित्सक हैं. दुनिया घूमना, नई जगहों पर जाना, वहाँ के लोगों, उनके जीवन को नजदीक से देखना, समझना एँव पुस्तकें पढ़ना उनके प्रिय शौक हैं. खुशनुमा माहौल में हुई इस बातचीत को हमने यहीं विराम दिया. धन्यवाद के साथ उनके जीवन के लिए शुभकामना देते हुए विदा ली.

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