डॉ. के. एन. सेलाडिया (क्षय रोग विशेषज्ञ)

डॉक्टर के. एन. सेलाडिया, जोकि क्षय रोग विशेषज्ञ हैं पिछले कई वर्षों से सूरत नगर निगम के साथ मिलकर क्षय रोग मुक्त सूरत मुहिम में लगे हुए हैं.

क्षय रोग की सूरत एवं भारत से संदर्भित जानकारी के लिए महक के प्रतिनिधि अविनाश मिश्रा ने उनसे विशेष मुलाकात की प्रस्तुत है उसके अंश आपके लिए..

प्र. ये टीबी मुक्त भारत मुहिम क्या है?
उ. भारत सरकार द्वारा भारत को क्षय रोग से मुक्त करने के लिए एक मुहिम चलाई जा रही है जिसका नाम रिवाइज्ड नेशनल टयूबरक्लोसिस कांट्रेक्ट प्रोग्राम है जिससे आर एन टी सी पी के नाम से जाना जाता है. जिसका उद्देश्य टीबी मुक्त भारत बनाना है.

प्र. आनएनटीसीपी कार्यक्रम के बारे में विस्तार रूप से समझाएं.
उ. यह एक संस्था है जो पूरे भारत में टीबी की जांच और उसका उपचार निशुल्क रूप से उपलब्ध कराती है.

प्र. आप इस संस्था के साथ किस रूप में कार्य कर रहे हैं.
उ. मैं आनएनटीसीपी के साथ जुड़कर सूरत शहर में टीबी के मरीजों को निशुल्क उपचार पहुंचाने का कार्य कर रहा हूं. साथ ही लोगों में क्षय रोग एवं उसके मरीजों के प्रति जो गलतफहमियां हैं उन्हें दूर करने की कोशिश कर रहे हैं.

प्र. एक टीबी मेडिकल अधिकारी की जिम्मेदारियां क्या होती हैं?
उ. एक टीबी ऑफिसर की पहली जिम्मेदारी अपने मरीजों की तरफ है. उन्हें सही समय से अपनी दवाएं मिल रहीं है या नहीं. वे समय से अपनी दवाई ले रहे हैं या नहीं और अगर वे दवाएं नहीं ले रहे हैं तो उन्हें देना और उनका ध्यान रखना होगा.

प्र. आप टीबी के मरीजों को किस प्रकार मार्गदर्शन प्रदान करते हैं.
उ. कई बार ऐसा होता है कि मरीज को जब पता चलता है कि वह क्षय रोग से ग्रसित है या उसकी टीबी की जांच पॉजिटिव आई है तब वह डर जाता है. उस वक़्त हमारे लिए पहली चुनौती होती है उसे ये समझाना कि टीबी का इलाज मुमकिन है और अगर सही तरीके से पूरा इलाज लिया जाए तो इस इलाज के बाद वह एक सुखी जीवन बिता सकता है.

क्षय रोग के प्रति हमारे समाज में नकारात्मक धारणा है लोग इसे छुपाते हैं. और इतना डर जाते हैं कि दवा लेने नहीं आते तब हम मरीज के घर जाते हैं. उसे समझाने की कोशिश करत है उसे दवा देते हैं यह दवा नि:शुल्क होती है.

हमारे सामने एक बड़ी चुनौती तब आती है जब मरीज यहां से किसी दूसरे शहर में चला जाता है. सूरत में अधिकांश मजदूर उत्तर भारत का है जो वर्ष में एक बार अपने गांव चले जाते हैं और फिर दो या तीन माह पश्चात वापस आते हैं. ऐसे में उनकी दवा बंद हो जाती है और उनका रोग बिगड़ कर खतरनाक होने की संभावना रहती है.

ऐस में हम उससे एक फार्म भरवाते हैं जिसमें उसकी पूरी जानकारी होती है इस फार्म को हम जिस शहर में वो जा रहा है.वंहा के स्वास्थ्य केन्द्र में भेज देते हैं ताकि उसे दवा लगातार मिलती रहे. यदि मरीज घर से स्वास्थ्य केन्द्र तक जाने में सक्षम नहीं है तो हम उसके लिए जितना नजदीक हो सके वहां तक दवा मिलने का इंतजाम करते हैं ताकि उसका इलाज हो सके.

डॉ. सेलाडिया से बातचीत के दौरान जानकारी मिली कि सरकार ओर वे स्वयं सूरत में इस रोग के रोगियों के लिए कितना कुछ कर रहे हैं. तब मन से एक आवाज आई गेरूआ वस्त्र पहने बिना भी इंसान समाज का सही मार्गदर्शक बन सकता है. धन्यवाद के साथ उनसे विदा ली.

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