ठंडक

ठंडक

कोहरे का घूंघट ,हौले से उतार कर ।
चम्पई फूलों से ,रूप का सिंगार कर ॥
अम्बर ने प्यार से ,धरती को जब छुआ ।
बरफीली ठंडक लिये ,महीना दिसम्बर हुआ ॥
धूप गुनगुनाने लगी ,शीत मुस्कुराने लगी ।
मौसम की ये खुमारी ,मन को अकुलाने लगी ॥
आग का मीठापन जब ,गुड से भीना हुआ ।
बरफीली ठंडक लिये ,महीना दिसम्बर हुआ ॥
हवायें हुयी संदली ,चाँद हुआ शबनमी ।
मोरपंख सिमट गये ,प्रीत हुयी रेशमी ।।
बातों-बातों मे जब ,दिन कही गुम हुआ ।

बरफीली ठंडक लिये ,महीना दिसम्बर हुआ ॥


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *