ट्रंप और मीडिया

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श्रीनिवासन और आलोक को विकसित देश और विचारों का ठप्पा लगाने वाले देश में नस्लीय नफरत का शिकार बनाया गया. ट्रंप के प्रवासी मुक्त अमरीका नारे का प्रभाव अमरीकी लोगों के विचारों पर स्पष्ट तौर पर नज़र आ रहा है दुनिया भर में ट्रंप की नीतियों का विरोध हो रहा है सवाल ये है कि जब चुनाव हो रहे थे तो मतदाता के मानस को हिलेरी की सार्वभौमिक नीतियां प्रभावित क्यों नहीं कर पाईं ? जिस देश में सर्वाधिक तौर पर समानता, आज़ादी और अधिकारों की बात की जाती रही हो, जहाँ सबके लिए समान तौर पर अवसर उपलब्ध रहते हों, वहां ट्रंप जैसे धुर राष्ट्रवादी विचारों के व्यक्ति की जीत सम्भव होने के कारण का विश्लेषण यूँ तो दुनिया भर के सभी मीडिया फोरम पर किया गया है लेकिन ये विश्लेषण इस समय नए सिरे से करने की जरुरत है.

ट्रंप की जीत में बड़ा योगदान रहा है इन्टरनेट की दुनिया का. मीडिया के नए रूप सोशल मीडिया का. ट्रंप के अमरीकी राष्ट्रपति के चुनाव में उम्मीदवार के रूप में आते ही, उसके राष्ट्रवादी, अमरीका की परंपरावादी समानता नीति के विरोधी , नारीवादी स्वतंत्रता और अधिकारों के विरोधी के रूप में उसकी छवि सामने आई. ट्रंप के वक्तव्य लगातार इसी उग्र रूप में आते रहे. इससे पूर्व होने वाले अमरीकी चुनावों की एक सहज धारणा रही है कि अमरीकी मीडिया का झुकाव जिस उम्मीदवार के पक्ष में होता है वही उम्मीदवार जीतता है ५ वर्ष पूर्व तक हुए चुनावों में ये मीडिया पारंपरिक मीडिया था जो की जनमानस में अपनी पहचान रखता था, उनके विचारों को प्रभावित करने की क्षमता रखता था जो सामान्य जनता में उम्मीदवारों के विचारों का प्रवाह बनाकर बहस छेड़ता था जिससे वोटर उम्मीदवार के मज़बूत और कमज़ोर दोनों ही पक्षों को समझ सकें, लेकिन पिछले पांच वर्षों में मीडिया के परिदृश्य में तेज़ी से बदलाव आया है.

पारंपरिक मीडिया जिसे आज ओल्ड या ट्रेडिशनल मीडिया के नाम से जाना जाता है जिसमें समाचारपत्र , रेडियो और टेलीविज़न शामिल हैं राजनीतिक समाचारों और उनकी विश्वसनीयता के लिए समाचारपत्रों की जगह निश्चित तौर पर मज़बूत थी इस मज़बूती में सोशल मीडिया ने सेंध लगाकर इसकी जड़ों को धीरे धीरे कमज़ोर कर दिया था इसका सही पता पारंपरिक अमरीकी मीडिया को हाल ही हुए राष्ट्रपति चुनावों से लगा. जहाँ पारंपरिक मीडिया ट्रंप के विरोध में खड़ा था एक स्वर में ट्रंप की नीतियों की आलोचना कर रहा था ट्रंप के विरोध में इस मीडिया ने भरपूर माहौल बनाने की कोशिश की , ट्रंप ने इस मीडिया और इसकी आवाज़ का मुकाबला किया एक नई लॉबी तैयार करके और ये लॉबी थी युवा वर्ग की जो जोश से भरा था, जो अपने लिए ऐशो आराम की जिंदगी चाहता है जो अपने हिस्से को किसी से बाँटना नहीं चाहता और सबसे महत्वपूर्ण जो परिणामों की दूरी तक नहीं देखता और न ही उनकी विवेचना करता है तात्कालिक फायदों की सोचने वाले इस समुदाय का भरपूर उपयोग किया गया.

ट्रेडिशनल मीडिया से मुकाबला करने के लिए इसकी सहायता से सोशल मीडिया पर ट्रंप का भरपूर समर्थन किया गया, पेज बनाये गए, फोरम खड़े किये गए, मूवमेंट चलाये गए. ट्रेडिशनल मीडिया के सामने मज़बूत दीवार की तरह खड़ा हो गया ये मीडिया.इसको चलाने वालों को सपने दिखाए गए ” ट्रंप के जीतते ही अमरीका में सिर्फ अमरीका के लोगों को रखा जायेगा, इससे देश में आतंकवादी हमलों की संभावना नहीं रहेगी, उनको ज्यादा रोज़गार मिलेगा. ” इन सब में उस युवा को जिसके पास न तो ज्यादा जानकारी होती हैं न ही कार्यों के परिणामों की विवेचना करने की शक्ति और समझ, उसे बेवक़ूफ़ बनाया गया. इस वर्ग ने ट्रंप के समर्थन और हिलेरी के विपक्ष के लिए माहौल बनाने के लिए उचित, अनुचित सभी कार्य किये चाहे वह हिलेरी की अनुचित तस्वीर हो या उनके वक्तव्यों का मज़ाक बनाना हो .

सारी दुनिया ने इस वर्ग और इस मीडिया की ताकत का कमाल देखा किस प्रकार समस्त ट्रेडिशनल मीडिया के विरोध के बावज़ूद ट्रंप जीत गए. समय आ चुका है कि इस मीडिया की ताकत को समझा जाये और इसका सही उपयोग हो विशेष तौर पर राजनीतिक क्षेत्र में क्योंकि राजनीतिक क्षेत्र से मानवता के अन्य सभी क्षेत्र सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं और इससे प्रभावित होते हैं. किरन संजीव

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