टीबी मुक्त भारत : क्षय रोग को मिटाने के सरकारी प्रयास

क्षय रोग यानि की टीबी को भारत से दूर करने के लिए सरकार द्वारा काफी प्रयास किए जा रहे हैं. जिसकी प्रक्रिया शिशुजन्म के साथ ही प्रारंभ हो जाती है. जन्म के तुरंत पश्चात दिया जाने वाला बीसीजी का वैक्सीन इसकी शुरूआत करता है. हालांकि इसकी सार्थकता और सफलता के बारे में माइक्रोकेयर लैब के डॉ. धनजी राजानी बताते हैं कि टीबी के वैक्टीरिया खुली हवा में घूमते रहते हैँ और कभी भी व्यक्ति पर आक्रमण कर सकते हैँ. इसलिए जन्म के तुरंत बाद लगाया गया ये टीका पूरी उम्र असर नहीं करता है. बच्चा जैसे जैसे बड़ा होता जाता है वैक्सीन का प्रभाव शरीर पर से कम होता जाता है. लेकिन बच्चे पर जन्म के काफी समय तक इस वैक्सीन का प्रभाव रहता है और वह बच्चे को टीबी होने से बचाता है.

सरकार द्वारा इस दिशा में किया गया दूसरा प्रयास है आरएनटीपीसी की स्थापना का. लेकिन यह प्रयास भारत जैसे बड़े और बहुसंख्यक आबादी वाले देश के लिए काफी कम है. आरएनटीसीपी के द्वारा मरीजों को निशुल्क दवाईयां मिलती हैं लेकिन जब तक वह पूर्ण रूप से स्वस्थ नहीं हो जाता है तब तक वह टीबी का वाहक बना रहता है. अत: टीबी के मरीजों के आईसोलेशन अर्थात उन्हें स्वस्थ समाज से दूर रखने की दिशा के प्रयास अत्यावश्यक हैं जैसे सेनेटोरियम का निर्माण जो कि पूर्व में हुआ करते थे या अन्य कोई जगह जहां केवल टीबी के मरीजों को रखा जाए और उनके उपचार का पूरा ख्याल रखा जाए.

यहां के चिकित्सक पूर्ण अनुभवी और प्रशिक्षित हों, साथ ही उनकी सुरक्षा भी यथा योग्य हो क्योंकि ये रोग हवा से फैलता है इसलिए चिकित्सक भी पूर्ण रूप से सुरक्षित रहें इसका ख्याल रखा जाए. अगर टीबी का मरीज सामान्य लोगों के साथ रहेगा तो वह कम से कम १० लोगों को टीबी के बैक्टीरिया सोंपेगा. यदि सरकार टीबी मुक्त भारत चाहती है तो यह व्यवस्था अनिवार्य है.

डॉ पारूल वडगामा बताती हैं भारत में लगभग ४० प्रतिशत लोगों को लैटेंट टीबी हैं अर्थात वह टीबी के कीटाणुओं द्वारा संक्रमित हो चुका है परंतु उसमें टीबी के कोई लक्षण नहीं होंगे.टीबी होने की संभावना सभी आयु वर्ग के लोगों के लिए समान होती है. बच्चों की तुलना में बड़ों को इसके होने की संभावना थोड़ी ज्यादा होती है क्योंकि बड़ों की रोग प्रतिरोधक क्षमता आयु बढऩे के साथ कम होती जाती है.

शुरूआती दौर में टीबी की जांच रक्त के नमूनों के द्वारा की जाती थी. भारत सरकार द्वारा इस प्रकार की जांच पर प्रतिबंध लगा दिया गया है. भारत सरकार ने टीबी की जांच के लिए ५० सरकारी अधिकृत प्रयोगशालाएं बनाई है तथा तीन निजी आधुनिक प्रयोगशालाओं को इसके लिए अधिकृत किया है जिसमें से एक सूरत में है जिसका नाम माइक्रोकेयर लैब है.

आधुनिक तरीके से की जाने वाली जांच तकनीकि विकास की वजह से काफी सरल और कम समय लेने वाली पद्घति है.इसके लिए जी-वन एक्सपर्ट नामक आधुनिक मशीन है जो महीनों में होने वाली जांच को दो घंटों में पूरा करके परिणाम देती है. इसके अलावा कल्चर पद्घति अर्थात संवर्धन किया जाता है लेकिन इस पद्घति से परिणाम आने मे कम से कम दो माह का समय लग जाता है.

क्षय रोग फैलने से कैसे रोकें

कहीं भी खुल में ना थूकें. यदि मजबूरी में थूकना पड़ जाए तो उस मिट्टी से ढंक दें.एन -९५ मॉस्क पहनकर घर से बाहर निकलें.दवाएं नियमित तौर पर लें.

क्षय रोग से बचाव

एन -९५ मॉस्क लगाएं.एयर प्यूरीफायर का हो सके तो उपयोग करें.स्वस्थ रहें और स्वस्थ तरीकों से जीवन व्यतीत करें.

इससे भारत टीबी के खिलाफ जंग लड़कर जीत सकता है. और देश टीबी मुक्त भारत बन सकता है.

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