जलता हुआ दार्जिलिंग

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कश्मीर की वादियों में बर्फ गिरना कब का बंद हो चुका है गिर रहे हैं तो सिर्फ पत्थर,  गूंज रहीं हैं तो सिर्फ गोलियों की आवाजें.  ये आग बुझी नहीं इससे पहले दार्जिलिंग की पहाड़ियां सुलग उठीं और  पूरी दुनिया को नज़र आ रहा है जलता हुआ दार्जिलिंग ये  केवल जलता हुआ दार्जिलिंग नहीं है वरन देश के हर राज्य में आग भड़क रही है.


  मध्यप्रदेश में किसान अपने ही सैनिकों की गोलियां खा रहा है उसके खेतों में लटकती लाशों और गोलियों का धुआं अभी शांत नहीं हुआ है.  एक तरफ बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय का वातारण युवाओं के नारो से गूंज रहा है इधर महाराष्ट्र भी जल रहा है ऐसा लगता है पूरा देश गृह युद्ध के दौर से गुजर रहा है किसी भी तरह की एकता या शांति का मतलब लोगों की आवाज बंद करना नहीं हो सकता, ये किसी भी सरकार को समझ नहीं आता है. 

पिछले दिनों पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा किये गए एक फैसले, भाषाई बाध्यता ने दार्जिलिंग को सप्ताह भर से युद्ध के मैदान में तब्दील कर दिया है. राज्य के सभी विद्यालयों में बांग्ला की अनिवार्यता ने सरकार और आम आदमी के मध्य टकराव पैदा कर दिया है. 


गोरखा जनमुक्ति मोर्चा की अगुवाई में इलाके के सभी राजनितिक दल राज्य सरकार के खिलाफ हिंसक विरोध पर उतर आये हैं.   इस नए विरोध के साथ साथ मोर्चा अपनी पुरानी मांग पृथक गोरखालैंड को भी आंदोलन से जोड़ चुका है तीन दशक पूर्व सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में अलग गोरखा लैंड  की मांग उठाई थी.   उस आंदोलन के बाद उन्हें अलग राज्य नहीं मिला लेकिन सरकार द्वारा दार्जिलिंग पर्वतीय परिषद् का गठन करके उन्हं  आंशिक स्वायत्ता देने का प्रयास किया गया था साथ ही गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन की स्थापना की गई. इसके प्रतिनिधियों का चुनाव संविधान प्रदत्त प्रणाली के प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा होता है एवं इन चुने हुए प्रतिनिधियों की स्थानीय शासन में अहम् भूमिका होती है. 


ताज़ा आंदोलन ने प्रसिद्ध पर्यटन स्थल दार्जिलिंग का आम जीवन अस्त व्यस्त कर दिया है इस मुद्दे को ममता बनर्जी ने अपनी मान मर्यादा से जोड़ लिया है और केंद्र  सरकार से ठनी हुई है. ममता इसे केंद्र की साजिश बताती हैं.   एक समय में पृथक गोरखालैंड की मांग का समर्थन करने वाली केंद्र की भाजपा सरकार इस मुद्दे पर दुविधा में है यदि भाजपा इस मांग का समर्थन करती है तो उसे बंगाली मतदाताओं के विरोध का सामना करना पड़ेगा इधर भाजपा पिछले कुछ समय से पश्चिम बंगाल में अपनी पहचान बना रही है.   


कश्मीर की तरह पर्यटन दार्जिलिंग के आम लोगों का मुख्य व्यवसाय तो है ही उनकी आय का मुख्य और बड़ा भाग इसी से उन्हें प्राप्त होता है लेकिन जिस तरह आतंककारी गतिविधियों ने कश्मीर के इस व्यवसाय को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर दिया है दार्जिलिंग में भी यदि समय रहते इन गतिविधियों को रोका नहीं गया एवं एक शांत और सौहार्दपूर्ण वातावरण बनाने में सरकार नाकामयाब रहती हैं तो दार्जिलिंग का पर्यटन व्यवसाय भी जल्दी ही मृतप्राय हो जायगा जिसका खामियाजा आम जनता को भुगतना होगा.


ममता बनर्जी इस आंदोलन के लिए समाधान नहीं निकाल पा रहीं हैं और जलता हुआ दार्जिलिंग देख रहीं हैं  ध्यान से  देखें तो ये समस्या आवाज सुनने की है. आम जनता की आवाज सरकार सुनने को तैयार नहीं होती है. जल्द ही इसका समाधान नहीं निकाला तो आंदोलन हिंसक हो सकता है  जलता हुआ दार्जिलिंग देश और दार्जिलिंग दोनों के लिए खतरनाक होगा.  


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