जयश्री शाह

सृजन एवं कल्पनाशक्ति नारी का सहज प्राक्रतिक गुण है . अपने इसी गुण को अपने कारोबर की नींव बनाने वाली जयश्री जी हमारे इस बार के पाखी स्तम्भ की नायिका हैं. जयश्री जी ने विवाह के पश्चात् अपने परिवार के पारम्परिक कार्य लकड़ी के हैंडीक्रॉफ्टआइटम बनाने के कार्य को अपने लिए चुना है अपनी रचनात्मकता का उपयोग करते हुए उन्होंने इस कार्य को आगे बढ़ाया. जे .जे. हैंडीक्रॉफ्टस के नाम से सूरत में उनका एक स्टोर भी है

पहले उनके परिवार में सिर्फ़ लकड़ी के बॉक्स बनाए जाते थे इस के साथ उन्होंने लकड़ी की मूर्तियों को भी अपने संग्रह में शामिल करना शुरू किया. इसके लिए प्रारंभ में वे इन मूर्तियों को जयपुर से मंगवाते थे बाद में इसके लिए जयपुर से कारीगर भी लाए और इन सभी आइटमों को खुद भी बनाना सीखा, जल्दी ही उनकी कल्पनाशक्ति और कारीगरी निखरती गई. तब से अब तक कि कारीगरी और कलात्मकता में आने वाले परिवर्तन के बारे में पूछे जाने पर वे बताती हैं पहले कारीगरी का सारा कार्य हाथ से होता था. डिजाइन को लकड़ी पर पेंसिल से बनाया जाता था इसके बाद उस डिजाइन को बचाकर बाकी की लकड़ी को हटाते थे अब ये सारा कार्य मशीन से होने लगा है. मशीन कि कार्विंग बढ़ गयी है उसमें ज्यादा फिनिशिंग होने कि वजह से लोग उसे ज्यादा पसंद करते हैं उसकी मांग बाज़ार में ज्यादा है साथ ही वह हाथ कि कारीगरी की तुलना में सस्ती भी ज्यादा पड़ती है.

मशीनों के प्रयोग को लेकर वे सकारात्मक सोच रखती हैं कहती हैं मशीन से डिज़ाइनिंग , ग्राफ़िक्स, प्रिंटआउट आदि निकलने से कार्य सरलतापूर्वक और बेहतर हो जाता है अब उनके संग्रह में अवॉर्ड ,ट्रॉफी, मैडल, बॉक्स ,मूर्तियाँ ,वॉल पीस आदि शामिल हैं. वर्तमान में लुप्त होती इस कला को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए वे कई तकनीकी महाविधालयों में समय समय पर कार्यशालाओं का आयोजन करते रहते हैं जिनमें स्कैट जैसा महाविधालय भी शामिल है . सूरत के शासकीय संग्रहालय में उनके परिवार के पूर्वजों द्वारा बनाए गए बॉक्स दुर्लभ एवं कलात्मक श्रेणी में रखे गए हैं

56 वर्षीय जयश्री जी के एक बेटा है जिसका विवाह हो चुका है बेटा और बहु भी इस कारोबार से जुड़े हुए हैं उनके जीवन में सकारात्मकता और उर्जा का प्रवाह इसी प्रकार बना रहे और वे अपनी कलात्मकता से समाज में अपना योगदान देती रहें. इसी शुभकामना के साथ हमने उनसे विदा ली .

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