चौबे जी छब्बे बनने चले दुब्बे रह गए….

रमेश बेहद खुश थे,और खुश भी क्यों न हो आज के समय में इंजीनियर बनना कोई छोटी बात तो है नहीं और आज उनïके बड़े बेटे अमित को इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला मिल गया है. गर्व से उनका सीना और चौड़ा हो गया है. खुशी चेहरे से ही नहीं बातों से भी फूटी पड़ रही है. रमेश अग्रवाल एक बड़े सरकारी अधिकारी हैं. पेशे से वे भी इंजीनियर हैं उनके दो बेटे हैं. बेटों के जन्म से ही उन्होंने अपने दोनों बेटों को इंजीनियर बनाने का सपना पाल रखा है. यूं तो स्वभाव से ठीक ठाक हैं, परंतु अग्रवाल साहब थोड़े घमंडी और साथ ही साथ चालाक किस्म के व्यक्ति हैं. जो दूसरों से अपने स्वार्थ की पूर्ति तो बेहिचक करवा लेते हैं परंतु स्वयं कभी किसी की मदद को आगे नहीं बढ़ते हैं, यहां तक कि उनकी सामाजिकता निभाने की परिपाटी भी पूरी तरह उनके मतलब पर ही टिकी हुई है. यदि कोई उन्हें कभी टोक भी दे तो थोड़ी बेशर्मी ओढक़र वे ये कïहने से भी नहीं चूकते भई, हम तो ऐसे ही हैं. हां, दूसरों को ताने मारना, उलाहने देना, व्यंग कसना, टोंड मारना आदि को वे अपना शानपूर्ण अधिकार समझते हैं.कïहने को तो वे इंजीनियर हैं परंतु मेहनत से उनका दूर दूर तक का नाता नहीं है. उनका वश चले तो वे नौकरी पर भी न जाएं,यदि सरकार उनको घर बैठने पर ही वेतन दे दे.चालाक इतने हैं कि अपने मतलब के लिए बातों को तोड़ मरोडक़र, झूठ बोलïकर या घाघपना दिखाकर अपनों को भी नहीं छोड़ते.घमंडी इतने हैं कि किसी जमाने की दादा परदादा की जमींदारी जो कि आज रही नहीं है का नशा आज तक गया नहीं है. कुर्सी पर यूं बैठते हैं जैसे कि राज सिंहासन पर बैठे हों. दूसरों को काम यूं बताते हैं जैसे अपनी जमींदारी के कारिंदों से बात कर रïहे हों. देखने लायक द्र्श्य तïब होता है जब कोई मेहमान घर में आता है तो उसे बेठक कक्ष में बिठा दिया जाता है. उनïकी पत्नी नूतन अंदर अपने पति को मेहमानों के आने की जानïकारी देती है और पानी पिलाती है. करीबन मेहमानों कोï १० मिनट का लंबा इंतजार कराने के पश्चात अग्रवाल साहब बैठïक में आते हैं और अपनी नियत कुर्सी पर राजा की तïरïह बैठ जाते हैं. खैर आज का दिन यानि कि १० जुलाई १९८० उनïके जीवन के लिएï बड़ा ही महत्वपूर्ण है. आज से उनके बेटे का इंजीनियर बनना तय हो गया और उनïके सपनों के आकार बढऩे का भी.

परिवार में सभी खुश थे.शाम तïक सभी को लैंडलाइन टेलीफोन से सूचना दे दी गई.बधाईयां ले ली गर्इं. आस पास मोहल्ले पड़ोस के लोगों का हफ्ते भर तक तांता लगा रïहा सभी बधाईयां दे रहे थे अग्रवाल साहब को और अग्रवाल साहब फूले नहीं समा रहे थे. भई, हमारा बेटा अब इंजीनियर बन गया है बड़े विभाग में बड़ा इंजीनियर बनेगा, क्या? जे.इ.एन? नहीं जी, ए.ई.एन से नीचे तो हम सोचते ही नहीं हैं.

पढ़ाई के तीन वर्ष तेजी से भाग गए अब अंतिïम वर्ष आते ही अग्रवाल साहब की आंखों में दूसरा सपना जगह बनाने लगा. बेटे की आलीशान नौकरी और शानदार विवाह. मजाक थोड़े ही है, लडक़ा इंजीनियर है. अमित के चौथे वर्ष में आने तïक घर में आए दिन जान पहचान वाले अपने जानïकारों की बेटियों के रिश्ते लाने लगे. अग्रवाल साहब हर रिश्ते को अपनी तराजू के हर बाट से तौलते. कितनी पढ़ी लिखी है? या क्या गुण हैं? वाली बात तो उनïके संग्रह में ही नहीं थे. उनïके सवाल थे पिता क्या करते हैं? कितना बजट है? जी, आठ लाख का?

बारातियों का स्वागत कैसे करेंगे, शादी में क्या सजावट होगी, दावत कितनी होंगी, दावत में क्या-क्या होगा? जैसे सवाल वे लडक़ी वालों से पूछते. अमित की इंजीनियरिंग खत्म हो गई, उसे किसी बड़े विभाग में सरकारी नौकरी तो नहीं मिली, हां एक प्राइवेट अच्छी कंपनी में जूनियर इंजीनियर की नौकरी थोड़ी भाग दौड़ और कुछ जान पहचान निकालïकर मिल गई. परंतु , देखिए, अग्रवाल साहब अभी भी सपनों की दुनिया में थे. उधर अमित भी सपने देख ïरïहा था. गोरी, लंबी, अभिनेत्री की तरïह खूबसूरत लडक़ी का यानि बेटे को रंभा चाहिए थी पत्नी के रूप में, पिता को लक्ष्मी चाहिए थी और नूतन अन्नपूर्णा और प्रत्येक कार्य में दक्ष बहू के सपने संजो रïही थी. लड़कियां देखने दिखाने का अंतहीन सिलसिला चल निïकला. हर लडक़ी देखने के बाद घर आने पर उसका पोस्टमार्टम किया जाता था. इधर वक़्त निकला जा रहा था. अमित का छोटा भाई सुमित मैनेजमेंट कोर्स करके एक छोटी से प्राइवेट कंपनी में मार्केटिंग का कार्य कर रïहा था उसïकी उम्र भी शादी लायक होने लगी थी. इधर अग्रवाल साहब को अपने सपनों के अनुसार अपने अमित के लिए कोई घर और कन्या नहीं मिल रïही थी.

एक रविवार के दिन सुबह ११ बजे अचानïक डोरबैल बजी. नूतन ने दरवाजा खोला. चश्मा लगाए अधेड़ उम्र के एक सज्जन खड़े थे.

“नमस्कार”

“नमस्कार” नूतन बोली.

जी, मैं मुजफ्फरपुर से आया हूं. अपनी बेटी नीलम के रिश्ते की बात लेकर.नूतन ने हाथ जोडक़र अभिवादन स्वीकार किया और अंदर आकर बैठने का इशारा किया. सज्जन दरवाजे के सहारे रखे सोफे पर बैठ गए. नूतन अंदर चली गई, अग्रवाल साहब को सूचित करने. सुमित ट्रे में पानी का गिलास ले आया. कुछ देर बाद नूतन बैठïक में आकर बोली आप ने पूर्व में सूचित नहीं किया. अग्रवाल साहब अत्यंत आवश्यक कार्य में व्यस्त हैं आप शाम को आकर मिलें. सज्जन जो कि सत्यम बंसल थे हतप्रभ ïरïह गए. खैर, नमस्कार करके उन्होंने विदा ली. इधर अग्रवाल साहब अपनी बुद्घि पर इतरा रहे थे, कि देखा, हमारे आगे कोई कुछ नहीं है. शाम चार बजे वे सज्जन पुन: तशरीफ लाए साथ में काजू कतरी का एक किलो का डब्बा. इस बार भी अग्रवाल साहब ने उन सज्जन को बीस मिनट इंतजार करवाया फिर बैठक में उन्होंने प्रवेश किया, बातचीत शुरू हुई. लडक़ी नीलम के पिता बैंक के उच्चाधिकारी थे. बेहद सज्जनता से बात करने वाले थे. सत्यम मस्तिष्क से बेहद चतुर और उंगली को टेढ़ी करके घी निïकालना जानते थे. लडक़ी देखना दिखाना तय हुआ. अगले माह की तारीख तय की गई. अग्रवाल साहब ने कहा आपको लड़की दिखानी है तो आपको ही आना पड़ेïगा हम कहीं नहीं जाएंगे. तय दिनांक को अमित और नीलम ने एक दूसरे को देखा. सांवला, मध्यम कद का अमित, लंबी, गोरी, खूबसूरत नीलम को देखते ही उसका दीवाना हो गया.अग्रवाल साहब ने घर जाकर जबाव देने को कहा. शाम को ही बंसल साहब को फोन पर सूचित कर दिया कि लडक़ी पसंद है कल आप आगे की बातचीत के लिए घर आ जाएं.

सुबह ११ बजे बंसल साहब अग्रवाल साहब के घर पहुंच गए. बातचीत शुरू हुई. अग्रवाल साहब ने पूछा- आपका बजट क्या है?

जी, लगभग चार लाख.

बहुत कम है.

जी, इससे ज्यादा मेरे लिए संभव नहीं है.

थोड़ा सा आगे बढि़ए.

जीï, मुश्किल है.

अजी, हमारा लडक़ा इंजीनियर है. ८-१० लाख के रिश्ते आ रहे हैं. आपïकी लडक़ी, लडक़े को पसंद है, इसलिए हम भी कुछ नीचे आ जाएंगे. आखिरकार लेन देन के पश्चात ६ लाख की राशि तय की गई.

चलिए ये तो ठीक है पर ये ६ लाख कैसे खर्च करना है हम बताएंगे.

जी ,बताइये.

विवाह की जगह हम तय करेंगे.

जी.

आपïको शादी करने यहां आना होïगा.

जी, कैसे संभव है? लडक़ी का विवाह तो उसïके आंगन से होता है.

‘जी, ठीक है परंतु समय बदल गया है, आप भी बदलिए.’ ‘ठीक है.’ ‘सजावट, जगह, वगैरह के ५० हजार.’

‘जी इतने कम में तो अच्छी जगह नहीं मिलेगी.’

‘आप उसकी फिकर न करें, वो हम देख लेंगे.’

‘लडक़ी के कपड़े आप १५ हजार में बना दें.’

‘जी लेकिन घर वालों के वस्त्र भी नए खरीदने होंगे’.

‘वो आप अलग से करें.’

‘अरे हां. अमित की मां, भाई, और मेरे नए सूट के रूपए आप ५० हजार दे दें.’

‘जी, आप के कपड़ों का पैसा मैं दूंगा?और ये कुछ ज्यादा नहीं है?’

‘देखिए ये सही है.’

नूतन बोली-‘और हां हमारे घर कें रिश्तेदारों के लिए भी आप ५१ साडिय़ां और शर्ट पैंट पीस भिजवा दें.’

‘जी, वो आप नहीं देंगे.’

‘अजी हम आप अलग-अलग थोड़े ही हैं. आप अपने रिश्तेदारों को देंगे और हम को नहीं, ये अच्छा नहीं लगेगा.’ अग्रवाल साहब बीच में बोले.

‘अरे हां, अग्रवाल साहब, क्योंकि हम यहां आकर शादी करेंगे, इसलिए हमें अपने शहर में एक खाना अतिरिक्त करना पड़ेगा.’ बंसल बोले.

‘वो आप जानें, ये ६ लाख रूपए तो एक प्रकार से हमारी अमानत हैं. इन्हें हम जैसे चाहे खर्च करवाएं.’

बंसल साहब, अग्रवाल साहब का मुंह देखते रह गए.

परंतु मन ही मन उन्होंने एक निश्चय कर लिया.

बातचीत खत्म हुई. बीच में एक प्याला चाय आई, एक छोटी प्लेट में नमकीन के साथ.

बसंल साहब घर पहुंचे, बेटी नीलम से बातचीत की.

नीलम ने अमित को फोन करना शुरू कर दिया. दोनों में घंटों बातें होती.लंबी लंबी बातें. अमित पूरी तरह नीलम के रंग में रंग चुका था.

ऐसे में अग्रवाल साहब ने संदेशा भिजवाया. एक लाख रूपया नकद अतिरिक्त भिजवाएं.

बंसल साहब ने अग्रवाल साहब को फोन किया.

‘आप का खत मिला.’

‘जी. एक लाख अतिरिक्त लगेगा.’

‘लेकिन सब कुछ पहले ही तय हो चुका था.’

‘हां तो क्या हुआ? ये तो चलता है.’

‘जी. नहीं चलता है. मुझे आप जैसे घमंडी, बदमिजाज, चालाक और लालची लोगों से अपनी बेटी का विवाह नहीं करना है मैं ये सगाई अभी तोड़ता हूं.’

अग्रवाल साहब हतप्रभ रह गए. घर में सबको पता लगने पर सब चुप थे. परंतु अग्रवाल साहब के घमंड का सांप फिर से फन उठाकर खड़ा हो गया. ‘अरे दूसरी लडक़ी देखेंगे.’

रात को दफ्तर से आकर अमित को सब कुछ मालूम पड़ा. तो बोला, ‘पापा, आपको और ज्यादा रूपयों की क्या जरूरत थी, और फिर नीलम इतनी अच्छी लडक़ी है.’

अमित पैर पटकता हुआ अंदर चला गया. अब मोबाइल का जमाना आ गया है तुरंत नीलम से बात की, करीबन एक घंटे तक दोनों लगातार बात करते रहे. बात खत्म होने पर अमित शांत हो गया.

हफ्ते भर बाद सुबह १० बजे का समय था. अग्रवाल साहब बैठक में कुछ पढ़ रहे थे. नूतन बाहर बरामदे में कपड़े सुखा रही थी. सुमित बाहर जाने के लिए तैयार खड़ा था.

तभी एक ऑटो मुख्य दरवाजे के सामने रूका. नूतन भी बाहर देखने लगीं.कुछ ही पलों बाद उनकी चीख सुनाई पड़ी. अग्रवाल साहब बाहर निकले, उनके पीछे पीछे सुमित भी.

बरामदे में अमित और नीलम खड़े थे वर-वधू की वेशभूषा में.

अमित बोला-‘पिताजी हमने कल ही कोर्ट मैरिज कर ली, आशीर्वाद दें.’

अग्रवाल साहब भौंचक्के से उन्हें देख रहे थे.

पूरे मोहल्ले के लोग सडक़, छतों और अपने अपने गेट पर झूल कर इस दृश्य का आनंद ले रहे थे.

तभी पीछे पीछे बंसल साहब हाथ में मिठाई का डब्बा लेकर अंदर आए. अग्रवाल साहब की तरफ डब्बा खोल कर बढ़ाते हुए बोले, ‘लीजिए, मुंह मीठा कीजिए. बच्चों ने विवाह कर लिया है अब वे पति-पत्नी बन चुके हैं.’

अग्रवाल साहब बंसल साहब के चेहरे की तरफ देखते रह गए. ऐसा लग रहा था कि बंसल साहब उनके ऊपर हंस रहे हैं जैसे कह रहे हों, क्या खूब बेवकूफ बनाया है आप को.

अग्रवाल साहब ने पत्नी नूतन की तरफ देखा और दोनों ने मन ही मन बोला, छब्बे बनने गए थे, दुब्बे ही रह गए.

डॉ. डी.एन.गुप्ता.

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