गुलाबी लिफाफा

विवाह के समय की शोख, खूबसूरत नमिता घर गृहस्थी के चक्कर में इस प्रकार उलझी कि अपनी तरफ ध्यान देना ही छोड़ दिया. रवि और सुषमा ने नमिता को फिर से अपने बारे में सोचने के लिए एक योजना बनाई. क्या थी वह योजना? क्या वह सफल हो पाई?

नमिता बच्चों और पति के दफ़्तर जाने के बाद जल्दी जल्दी सारा काम समेटने लगी. जगह जगह कपड़े फैले हुए थे. कपड़ों को धोने ले जाने के लिए समेट रही थी कि रवि के पैंट की जेबें संभालते हुए उसमें उसे एक गुलाबी कागजों का पुलिंदा मिला, उसे निकालकर देखने लगी कि कहीं कोई जरूरी कागज तो नहीं है. कागजों को खोलते ही लगा ये तो कोई पत्र है. न चाहते हुए भी उसकी निगाहें खत के अक्षरों पर अटक गईं. ये कोई अधूरा खत था जो कि किसी लडक़ी ने लिखा था. वो रवि को लिखा गया खत था जिसमें रवि से प्रेम की बातें की गई थी. चांद, फूल, ओस. पत्र हाथ में लिए हुए नमिता धम्म से कुर्सी पर बैठ गई. उसके हाथ पैर कांप रहे थे. सिर घूम रहा था. आंखों के आगे अंधेरा छा रहा था. कितना समय निकल गया उसे मालूम ही नहीं पड़ा. बच्चों के शोर से उसकी तंद्रा टूटी, वे स्कूल से आ गए थे. दोनों ने बस्ते सोफे पर फेंके और शोर करने लगे. रितू पूछ रही थी खाने में क्या बनाया है मां? मोहित बोला जल्दी खाना दो, मां, जोर की भूख लगी है. नमिता उठी सामान समेटने लगी, बच्चों के लिए उसने दाल चावल बनने गैस पर चढ़ाए और काम में लग गई. बच्चों के कपड़े उतारे फिर घर की सफाई में लग गई. बच्चों को खाना परसा. वे खाना खाने लगे तब वह बरतन साफ करने और रसोई उठाने में लग गई. सब काम खत्म करते चार बज गए थे. उसने अभी तक कुछ खाया भी नहीं था. नहा कर कपड़े सुखाने लगी. सब काम खत्म करके घड़ी देखी शाम के पांच बज रहे थे. थोड़ी देर में रवि आ जाएंगे. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि ये खत किसका था. उसमें नाम नहीं लिखा था. कौन है वो? कहां रहती है? ये सब कबसे चल रहा है. क्या वो इसके बारे में रवि से बात करे? क्या पूछे? खत दिखाकर रवि से बात करे? थोड़ी देर में रवि आ गए, रवि कुछ गुनगुना रहे थे. नमिता ने चाय चढ़ा दी. देखा रवि किसी से मोबाइल पर धीरे धीरे बात कर रहे थे और मुस्कुरा रहे थे. नमिता का दिल डूबने लगा. उसकी हिम्मत ही नहीं हुई रवि से इस बारे में कुछ पूछने की. खाना बनाते, सभी को परोसते, खिलाते, रसोई समेटते रात को दस बज गए थे. उसने रवि से पूछा दूध लेंगे. रवि ने हां में चेहरा हिलाया. रवि के लिए दूध लेकर उसकी स्टडी में पहुंची तो देखा वो गुलाबी रंग के लिफाफे में कुछ कागज रख रहा था उसकी सांसें रूक गर्इं. रवि ने उस लिफाफे को गोंद से चिपका कर मेज पर ही रख दिया. उसकी तरफ देखे बिना दूध का गिलास उसके हाथ से लेकर पी लिया और सोने चला गया. नमिता बिस्तर पर लेटी लेकिन नींद उसकी आंखों से कोसों दूर थी. उसके और रवि के विवाह के चौदह वर्ष हो चुके हैं. बारह वर्ष का बेटा अमित और ९ वर्ष की बेटी रिया हैं. रवि शुरू से उसे बहुत प्यार करता था और वह भी अपनी गृहस्थी के लिए पूरी तरह समर्पित थी. इस बीच उसने कभी सोचा ही नहीं था ये सब हो जाएगा. रवि ऐसा कैसे कर सकते हैं.

अगले दिन रवि के दफ्तर जाने तक वह इसी ऊहापोह में उलझी काम में लगी रही. किसी काम में उसका मन नहीं लग रहा था. दोपहर को तीन बजे के आसपास घर की डोरबैल बजी. दरवाजा खोला तो कूरियर बॉय खड़ा था. गुलाबी रंग का लिफाफा उसे देकर उसने उसे हस्ताक्षर करने को कहा. अब तो उसके पैरों तले जमीन निकल गई. लिफाफे को उलट पुलट कर देखा न भेजने वाले का नाम था न पता. उसने निश्चय किया कि ये सब क्या है वो पता करके रहेगी.

शाम को रवि के आने पर उसने लिफाफा रवि को देते हुए पूछा

‘किसका पत्र हैं?’

‘मेरे एक दोस्त का’ रवि ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया.

लिफाफे को लेकर रवि अपनी स्टडी में चला गया. पूरा सप्ताह निकल गया. नमिता पत्रों का आना और जाना देखती रही. आखिर एक दिन उसने हिम्मत करके रवि की मेज पर से उसका लिखा हुआ लिफाफा उठा कर रख लिया. सुबह रवि ने उससे पूछा

‘नमिता, मैंने यहां एक लिफाफा रखा था तुमने देखा क्या? ’

‘नहीं’ नमिता ने झूठ बोल दिया. रवि के दफ्तर जाने के बाद नमिता ने लिफाफे खोलकर उसमें रखे गुलाबी कागज कांपते हाथ से बाहर निकाले. उन्हें पढऩे लगी. रवि ने खत किसी शोना नाम की लडक़ी को लिखा था. खत में लिखा था शोना तुम इतनी अच्छी लगती हो कि तुम्हें देखते रहने को मन करता है. इतनी व्यवस्थित, इतनी सादगी की खूबसूरती, तुम्हारे पास समय है मेरी बातें सुनने का, मुझसे बातें करने का, मुझे पत्र लिखने का, एक मेरी पत्नी है. मैं उसे किसी प्रकार का धोखा देना नहीं चाहता उससे बेहद प्यार भी करता था मैं. परंतु उसके पास समय ही नहीं है मेरी बात सुनने का, मुझसे बात करने का. जब भी बात करती है रसोई के समान की या बच्चों की. जब भी सामने आती है अस्तव्यस्त. मसालों, घी, तेल खाने की गंध उसके कपड़ों से रात को भी आती रहती है. हमेशा थकी, परेशान. कहीं घूमने जाने का मन हो तो उसके काम से उसे फुर्सत ही नहीं मिलती. प्यार से हाथ थामों तो हल्दी से नाखून तक पीले नजर आते हैं. अब तुम्हीं बताओ मेरा मन किसी और को चाहे तो इसमें मेरा क्या दोष?

इसके आगे नमिता पढ़ ही नहीं सकी. आंखें पानी से भर आईं, वो सोच में डूब गई. उसे इसका कोई हल समझ नहीं आ रहा था. सोच विचार कर उसने अपनी प्रिय सहेली सुषमा को फोन मिलाया.

भरे गले से उसे सारी बात बता दी. सुषमा कुछ सोचकर बोली-देख नमिता बात अभी भी तेरे हाथ से निकली नहीं है .हालांकि ये रवि की गलत बात है,लेकिन उसके पत्र में ही तेरी समस्या का समाधान भी छुपा हुआ है. तू खुद में बदलाव कर, अपने ऊपर ध्यान दे .अपने लिए समय निकाला कर. रवि के साथ समय व्यतीत किया कर. उसकी शिकायतें दूर कर फिर देख आगे क्या होता है .यदि तेरे प्रयास से सब ठीक होता है तो ठीक है, अन्यथा तब हम रवि से बात करेंगे .नमिता फोन रखने के बाद सोच में पड़ गई .सुषमा ठीक ही कह रही है .रवि ने पत्र में सही तो लिखा है ,उसने अपने हाथों पर निगाह डाली. सूखे ,रूखे हाथ, नाखूनो में भरे मसाले ,बेतरतीब ढंग से बढ़े हुए नाखून, खड़े हो कर अपने आप को शीशे में देखा तो लगा किसी अजनबी का चेहरा देख रही है .उलझे, रूखे बाल, थकी हुई आंखें,पपड़ाए होंठ, आंखों के नीचे गहरे काले घेरे ,गरदन पर जमी हुई मैल की परत. ये तो नमिता नहीं है! वो तो ताजगी, स्फूर्ति से भरी शोख लडक़ी थी जब उसका विवाह हुआ था. कहां गलत हुआ ? क्या गलत हुआ ? दिसंबर का महीना था शाम को रवि दफ्तर से हड़बड़ी में वापस आया और जल्दी-जल्दी अपने कपड़े बैग मे रखने लगा. नमिता ने पूछा

‘कहीं जा रहे हैं क्या?’

‘हां ’‘दफ्तर के काम से दिल्ली जाना पड़ रहा है.’

‘वापस कब तक आएंगे?’

‘लगभग महीने भर का कार्यक्रम है .बाकी तुम्हें वहां पहुंचकर फोन कर दूंगा.’

‘ठीक है ’

नमिता ने उत्तर दिया. थोड़ी देर में ही टैक्सी आ गई .उसमें रवि के कार्यालय के दो सहकर्मी और बैठे थे .नमिता उन्हे पहचानती थी ,उनसे नमस्ते करके रवि को हाथ हिलाकर नमिता ने आशंकित मन से विदा किया.

उनके जाते ही सुषमा का फोन आया. सुषमा के पति सुहास भी रवि के साथ ही दफ्तर में कार्य करते थे और वे भी दिल्ली गए थे .दोनों सहेलियो ने तय किया कि नमिता अपने बाचों को लेकर सुषमा के घर थोडे दिन रहेगी और बाद में थोड़े दिन सुषमा उनके घर. दोनों के बच्चे भी एक ही स्कूल में पढ़ते थे .

नमिता ने घर बंद किया और ऑटो करके सुषमा के घर चली गई .सुषमा के बच्चों के साथ रहने की बात सुनकर ही अमित और रिया खुश हो गए. सुषमा दरवाजे पर ही नमिता का इंतजार कर रही थी. दोनों सहेलियां बैठकर मन की बातें करने लगीं .चारों बच्चे अपने कमरे में खेलने लगे .सुषमा ने थोड़ी देर में अपने बेटे को आवाज दी. बेटे से खाने की टेबल लगाने के लिए कहा. नमिता बोली

‘ये कर लेगा?’

‘क्यू, नहीं दोनों भार्इ बहन मिलकर खाना परस लेंगे और बाद में टेबल उठा भी देंगे.’

नमिता हैरान रह गई .सुषमा ने सलाद काट दी और उन सबने साथ बैठकर खाना खाया.

नमिता सोच रही थी उसे कितने साल हो गए हैं इस तरह अपने घर में सबके साथ खाना खाए हुए. वो तो टेबल लगाकर सब को गर्मा गर्म खाना खिलाती है फिर टेबल उठाती है .रसोई साफ करती है तब जाकर ठंडा खाना खाती है .उसने देखा खाना खाने के बाद बच्चों ने टेबल साफ किया फिर वे सुबह स्कूल जाने की तैयारी खुद करने लगे .नमिता को आश्चर्य से देखते देख कर सुषमा बोली अपने लिए समय निकालना है तो काम को बांटना ही पड़ेगा.

अगले दिन से सुषमा ने नमिता का रूटीन चार्ट बना दिया. सुबह योगा, फिर ताजी हवा मे चाय के साथ अखबार, थोड़ा घर का काम उसके बाद अपना पैडीक्योर, मैनीक्योर, फेस पैक लगाना. आराम से नहाना, बच्चों के स्कूल से आने के बाद उनको अपनी यूनीफार्म ,बैग, टिफिन, बॉटल जगह पर रखना. सब के साथ में खाना खाने के बाद थोड़ी देर सबका साथ में आराम करना. शाम चार बजे से बच्चों को साथ बिठाकर पढ़ाना और शाम को बच्चों का अपने आप दूध करना और नाश्ता लेना. नमिता का सलीके से तैयार हो कर शाम की सैर पर सुषमा के साथ जाना. खाना दोनों मिलकर बनातीं . सुषमा ने बताया खाना बनाने में वो अपने पति सुहास की सहायता लेती है .खाना बनते ही बच्चे टेबल लगाते और खाने के बाद टेबल भी उठाते .सुषमा बच्चों के सुबह के टिफिन तैयार करती फिर बच्चे थोड़ी देर आपस में खेलते या कुछ पढ़ते .सुषमा और नमिता आपस में बैठकर दिन भर की चर्चा करते ,टीवी देखते अब नमिता को अपनी गलती समझ आ गर्इ थी. उसने अपने घर में सारे काम खुद ही संभाल रखे थे .छोटे से बड़े सभी लोगों के सभी काम. उसे अपने लिए समय ही नहीं मिलता था. इसलिए वो रवि को भी समय नहीं दे पाती थी. थके हारे चेहरे पर एक मुस्कान तक नहीं आ पाती थी.

समान परिस्थितियों में ही सुषमा थी लेकिन उसके पास अपने और पति के लिए पर्याप्त समय था. लगभग दो हफ्ते वो सुषमा के घर रही. उसके बाद वे सभी उसके घर आ गए. यहां आकर इस बार उसने जिम्मेदारियों का बंटवारा किया. महीने भर में वह सेहतमंद स्वस्थ और फुर्तीली तो हुई ही उसकी खोई खूबसूरती भी वापस लौट आई .

आज नया वर्ष था एक जनवरी का दिन था. शाम के पांच बज रहे थे .नमिता बच्चों को पढ़ा रही थी तभी डोरबैल बजी .नमिता ने दरवाजा खोला. देखा सामने रवि खड़े थे .रवि नमिता को देखता रह गया.

तरो ताजा, महकती हुई, संवरी नमिता बेहद आकर्षक लग रही थी. मुस्कुराते हुए नमिता ने उनका स्वागत किया. थोड़ी देर बाद ही सब लोग साथ बैठकर चाय पी रहे थे तभी रवि ने एक गुलाबी लिफाफा निकालकर नमिता की तरफ बढ़ाया. नमिता कुछ समझ नहीं पाई .उसने असमंजस की स्थिति मे लिफाफा खोला, उसमें एक कागज रखा था जिस पर लिखा था तुम बहुत ही प्यारी, खूबसूरत पत्नी हो .

नमिता आश्चर्य से रवि का चेहरा देख रही थी. रवि ने पुराने सभी गुलाबी लिफाफे उसे देते हुए कहा ‘इन सभी में वही खत है जो तुम ने पढें हैं .’

‘और ये लोग दिल्ली नहीं गए थे वरन पहले पंद्रह दिन तुम्हारे और बाकी पंद्रह दिन हमारे घर पर थे ’सुषमा ने आगे कहा. सुहास हंस रहे थे. रवि ने बताया

‘ये सब कुछ सिर्फ तुम्हें तुम्हारा ख्याल रखना सिखाने के लिए बनाया गया प्लान था’

‘और सुषमा तुम भी इसमें शामिल थीं ’नमिता आश्चर्य से बोली सभी मुस्कुरा रहे थे .नमिता सुखद अनुभूति महसूसकर रही थी. उसने रवि की तरफ देखते हुए कहा

‘तो ये है गुलाबी लिफाफे का राज’

सभी की हंसी से वातावरण गूंज रहा था. नमिता और रवि दोनों की जिंदगी में नया वर्ष खुशियां ले कर आया था.

डॉ. डी.एन गुप्ता

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