गणेश चतुर्थी

गणेश चतुर्थी से प्रारम्भ होकर अनंत चौदस तक मनाया जाने वाला गणेश उत्सव पूरेदेश में मनाया जाता है गुजरात और महाराष्ट्र का तो ये मुख्य त्यौहार है वास्तविक रूप से इस त्यौहार को महाराष्ट्र में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा प्राम्भ किया गया था गुजरात,महाराष्ट्र के काफी नजदीक है इसलिए गणेश उत्सव गुजरात के भी मुख्य त्योहारों में शामिल है

गणशोत्सव का प्राम्भ तिलक द्वारा सार्वजनिक उत्सव के तौर पर किया गया था जिसका उद्देश्य आजादी से सम्बंधित गतिविधियों को ब्रिटिश सरकार से छुपाकर, समूह में गुप्त तौर पर चर्चा और संचालित करना होता था समय के साथ त्यौहार के स्वरुप और मनाने के तरीके में अत्यंत परिवर्तन आ गया है अब ये त्यौहार सिर्फ गणेश पूजा और उस दौरान होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों तक सिमट गया है.

दस दिवसीय इस उत्सव के दौरान गणपति मूर्ती की स्थापना से लेकर विसर्जन तक के समय में मोहल्लों , गलियों , सोसायटीयों में गणेश पूजा अर्चना के पश्चातविभिन्न वेशभूषा , ड्रामा , डांस , मोनोएक्टिंग ,अंत्याक्षरी जैसी सांस्कृतिक एवं भजन ,कथापूजा जैसी धार्मिक गतिविधियां संचालित की जाती हैं लोग इस दौरान पूरे उत्साह में रहते हैं यहाँ तक इस त्यौहार का बदलता रूप समय का परिवर्तन है परंतु इस बदलाव के दौरान हुई अंधविश्वास और अवैज्ञानिक कुरीतियों का बढ़ना सोचनीय है.

प्रशासन भी अब इस को समझकर सामजिक संगठनों की मदद से इस दिशा में कार्य करने लगा है जिसमें सबसे बड़ी समस्या थी मूर्तियों का प्लास्टर ऑफ़ पेरिस से बना होना प्लास्टर ऑफ़ पेरिस से बनी मूर्तियां विसर्जित होने के पश्चात् अगले दिन बड़ी दुर्दशा में नज़र आती हैं वे डूबती नहीं हैं ना ही गलती हैं साथ ही जल के स्तर को कम करती हैं जिससे नदी तालाब उथले होने लगते हैं और थोड़ी सी बारिश में भी वे पानी को ग्रहण नहीं कर पाते हैं नतीजा शहर में जगह जगह भरे पानी और नदी किनारे बसे शहरों में बाढ़ के रूप में सामने आता है ये प्लास्टर ऑफ़ पेरिस जलीय जीव जंतुओं के लिए मौत का दूत बन जाता है दूसरी बड़ी समस्या मूर्तियों का बढ़ता आकार है श्रद्धा बढ़े या न बढ़े लेकिन प्रतिवर्ष मूर्तियों का आकार बढ़ता ही जा रहा है २५ फीट तक की मूर्तियां बनती हैं जिनका विसर्जन अपने आप में एक बड़ी समस्या होता है इन मूर्तियों के विसर्जन के समय कई बार सेवा दल { जो की विसर्जन का कार्य करता है ] की नावें उलट जाती हैं जिससे की जानभी चली जाती हैं तीसरी बड़ी समस्या मूर्तियों को बहाने के लिए अतिरिक्त पानी की है जिस देश में पीने के पानी की समस्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है वहां मूर्ती विसर्जन के लिए बांधों से अतिरिक्त पानी छोड़ना पड़ता है.

अकेले सूरत में ही गणेश मंडल द्वारा सत्तर हज़ार क्यूसेक पानी छोड़ने की सरकार से मांग की गयी थी जो की सरकार द्वारा अस्वीकार कर दी गयी क्योंकि ये पानी सूरत शहर की १५ दिन के पीने के पानी की जरूरत पूरी कर सकता है. इस वर्ष उच्च न्यायालय केआदेशानुसार मूर्तियों की अधिकतम ऊंचाई ५ फुट रखने को कहा गया है साथ ही प्लास्टर ऑफ़ पेरिस की मूर्तियों पर प्रतिबन्ध कड़ा किया गया है लेकिन फिर भी ऐसी मूर्तियां काफी तादाद में बनती और बेचीं जाती हैं क्योंकि ये मूल्य में सस्ती, दिखने में मिटटी की मूर्तियों की तुलना में ज्यादा आकर्षक और खूबसूरत मनचाही डिजाइनों , रूपों में उपलब्ध होती हैं.

इन बड़ी समस्याओं को छोड़ भी दें तो छोटी ढेरों ऐसी समस्याएं हैं जो लोगों की नासमझी और उत्सव का रूप बदल देने के कारण पैदा हो रहीं हैं. जिनमें से एक मूर्तियों की बढ़ती संख्या है सार्वजनिक गणेश महोत्सव का अर्थ भूलकर लोग इसे घर घर स्थापित और विसर्जित करने लगें हैं जिससे मूर्तियों पर लगे रासायनिक रंगों की मात्रा भी पानी में बढ़ती जा रही है हालाँकि पिछले कई वर्षों से प्रशासन इन सभी समस्याओं से युद्ध स्तर पर लड़ रहा है सामजिक संस्थाओं के साथ मिलकर लोगों में जागरूकता फैलाई जा रही है इन सभी समस्याओं का समाधान जनता की समझदारी और जागरूकता से ही संभव है.

गणपति बाप्पा मोरिया , अगले बरस तू जल्दी आ के जयकारों के बीच बाप्पा की बनाई प्रकृति को सुरक्षित रखने का वादा ही बाप्पा के लिए सबसे प्रिये विदाई का वादा होगा.

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