गणेश का विवाह

गणेश का विवाह
गणेश का विवाह


यूँ तो  गणेश को लेकर कई कहानियां प्रचलित हैं  आज की कहानी उनके विवाह को लेकर है गणेश का विवाह कैसे हुआ गणेश का विवाह क्यों हुआ इन दोनों ही बातों के उत्तर आपको इस कहानी में मिलेंगे एक  समय की बात है तब श्री गणेश श्री गंगा जी के पावन तट पर तपस्या में लीन थे. उनके नेत्र आधे खुले हुए थे और उनका ध्यान श्री हरि के चरणों में लगा हुआ था . श्री गणेश का ध्यान सदैव ही श्री हरि  के चरण कमलों  में  लगा रहता है.   
इस समय वे रत्न जड़ित एक सिंहासन पर विराजमान थे. उनके शरीर के  समस्त अंग चन्दन के लेप से सुगन्धित हो रहे थे . उनके कंठ  में पारिजात के फूलों की माला एवं  अनेकानेक स्वर्ण रत्न जड़ित हार सुशोभित थे. कोमल रेशम का पीताम्बर उनकी कमर में  लिपटा हुआ था. कितने ही रत्न जड़ित विविध आभूषण उनकी भुजाओं  की शोभा बढ़ा रहे थे. उनके मस्तिष्क पर करोड़ो सूर्य सा देदीप्यमान मुकुट और कानों में कुण्डल चमक रहे थे.     उनकी सुन्दर सूँड तथा श्वेत दन्त भी मुख की शोभा बढ़ा रहे थे. श्री गणेश योग निद्रा में अत्यंत देदीप्यमान और प्रकाशवान लग रहे थे.    

इसी समय श्री धर्मपुत्र की सुकुमारी सुकन्या तुलसी देवी  श्री हरि का स्मरण करते  हुए तीर्थाटन पर निकलीं थीं . तुलसी देवी भ्रमण करते हुए श्री गंगा के तट  पर जहाँ श्री गणेश जी विराजमान थे , वहां पहुँच गईं.  
तुलसी श्री गणेश के इस अलौकिक रूप को देख कर मोहित सी हो गईं. वे सोचने लगी  कितना अलौकिक और अद्धभुत रूप है पार्वती नंदन का ? तुलसी जी के मन में विचार आया कि  गिरिजा नंदन मेरे अनुरूप एवं अत्यंत उपयुक्त वर हैं. उनके मन में विचार आया कि एकदन्त जी से संवाद करके उनके भी विचार जानना चाहिए. मुमकिन है वे भी इसी प्रयोजन से तपस्या में लीन हों. 
तत्पश्चात तुलसी जी ने गजेंद्र के समीप जाकर निवेदन किया और भावपूर्ण वंदना की.    तुलसी जी को देख गणेश्वर कुछ अचकचा से गए. इससे पहले उन्होंने देवी तुलसी को कभी देखा न था. अतः वे सोच में पड़ गए -‘ ये देवी कौन हैं और किस प्रयोजन से यहां आईं  हैं ?’ 

तदुपरांत महादेव पुत्र श्री गणेश बोले  हे देवी आप कौन हैं ? आप को पहले कभी नहीं देखा और आप किस प्रयोजन से आई हैं ? तथा मेरी तपस्या में विघ्न डालने का आपका कारण  क्या है, कृपया विस्तार में समझाइये .    ‘
तुलसी जी बोलीं  हे गणेश्वर ! मैं धर्मपुत्र की कन्या तुलसी हूँ. आपको यहाँ तपस्या करते देखकर उपस्थित हो गई हूँ और आपसे कुछ देर बात करना चाहती हूँ .  
यह सुनकर शिवपुत्र बोले – ‘देवी, आपको इस तरह तपस्या में विघ्न नहीं डालना चाहिए.  सर्वथा अकल्याण ही होता है. श्री भगवान आपका मंगल करें . आप कृपया यहाँ से चली जाएँ  .   
इसपर धर्मपुत्री तुलसी ने अपनी व्यथा कही , हे पार्वतीपुत्र ! मैं अपने मन अनुकूल वर की खोज में तीर्थाटन को निकली हूँ. अनेक वर देखे किन्तु मुझे आप पसंद  आये अतएव आप   मुझे अपनी भार्या के रूप में स्वीकार करके मुझसे विवाह कर लीजिये.    
गणाधीश बोले –  हे माता ! विवाह कर लेना जितना सरल है उसका निर्वाह करना उतना ही कठिन है. मैं ज्ञान प्राप्ति को ही अपना जीवन उद्देश्य बन चूका हूँ  अतः विवाह मेरे  ज्ञान की प्राप्ति में बाधक बन सकता है.अतएव हे माता ! आप मेरी ओर  से चित्त हटा लें.     मुमकिन है आपको खोजने पर मुझसे अच्छे अनेक वर मिल जायेँगे.  

गणेश का विवाह
गणेश का विवाह  



श्री तुलसी बोलीं –  हे एकदन्त ! मैं तो आप ही को मनोनुकूल वर के रूप में देखती  हूँ   इसलिए आप मेरी याचना को ठुकराकर निराश ने करें .  कृपया मेरी प्रार्थना स्वीकार कर लें.

यह सुनकर एकदन्त बोले , विवाह तो मुझे करना ही नहीं है सो मैं आपके प्रस्ताव को स्वीकार कैसे कर सकता हूँ. आप मुझे क्षमा करें  तथा  अपने  लिए  कोई और वर खोज लें  ‘
तुलसी माता को यह बात अत्यंत  नागवार गुज़री उनके  बहुत अनुनय – विनय पर श्री गणेश टस  से मस  ने हुए , इस पर माता तुलसी को क्रोध आ गया और उन्होंने श्री गणेश जी को श्राप दे डाला.    
तुलसी जी बोलीं, ‘हे उमा नन्दन ! मैं कहती हूँ कि आपका विवाह तो अवश्य होगा.     और मेरा ये वचन मिथ्या न होगा.    
तुलसी जी द्वारा दिए गए शाप को सुनकर श्री गणेश भी श्राप दिए बिना न रह सके , उन्होंने तुरंत कहा,हे देवी ! आपने व्यर्थ ही श्राप दे डाला है , इसलिए मैं भी कहता हूँ की आपको जो पति प्राप्त होगा वह असुर होगा. इसके पश्चात महापुरुष के श्राप से आपको वृक्ष होना होगा.    

श्राप सुनकर तुलसी जी भयभीत हो गई. उन्होंने गणेश्वर से कृपा की याचना की.     वे बोलीं, हे देव ! मुझ पर कृपा कीजिये.  मेरे इस अपराध को क्षमा कीजिये.  हे देवो के देव – आप तो दयालु हैं , विघ्नहर्ता हैं. आपने ही  मुझे श्राप दिया है उसका निवारण भी आप ही कर सकते हैं.  हे दुःखहर्ता ! मेरा दुखों  का नाश कीजिये.    

गणेश जी सरल और सहज स्वाभाव के होने के साथ साथ दयालु ह्रदय के भी हैं , वे बोले,हे देवी ! आप समस्त सौरभवंत पुष्पों की सारभूता बनेंगी. आपको भगवान् श्रीनारायण की प्रिया बनने का सौभाग्य प्राप्त होगा.  यद्यपि समस्त देव गण आपसे प्रसन्न रहेंगे, तथापि भगवन श्री हरि  की आपके प्रति विशेष प्रीति रहेगी. मनुष्यलोक में आपके ही माध्यम से श्री हरि  की भक्ति करने पर मोक्ष की प्राप्ति होगी. किन्तु आप मेरे द्वारा सदैव  ही त्याज्य रहेंगी.    
  तदुपरांत , जैसा की ज्ञात है  कालांतर में वही तुलसी वृंदा हुईं और उनका  विवाह दानव राज शंखचूड़ से हुआ. शंखचूड़ पूर्व जन्म  में भगवन श्री कृष्ण के पार्षद  सुदामा थे जो श्री राधा के श्राप से असुर योनि को प्राप्त हुए थे. शखचूड़ भार्या अर्थात देवी तुलसी घटनाओं के चक्र से गुजरकर वृक्षभाव को प्राप्त होती हुईं श्री हरि  की परम प्रिय हुईं.    

डॉ. संध्या राठोड

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