खत कैसे लिखूं

लिखना चाहूं भी तुझे खत तो बता कैसे लिखूं
ज्ञात मुझे तो तेरा ठौर ठिकाना भी नहीं
दिखना चाहूं भी तुझे तो मैं बता कैसे दिखूं
साथ आने को तेरे पास बहाना भी नहीं
जाने किस फूल की मुस्कान हंसी है तेरी
जाने किस चांद के टुकड़े का तेरा दर्पण है
जाने किस रात की शबनम के तेरे आंसू हैं
जाने किस शोख गुलाबों की तेरी चितवन है
कैसे खिडक़ी है वह किस रंग के परदे उसके
तू जहां बैठ के सुख स्वप्न बुना करती है
और वह बाग है कैसा कि रोज तू जिससे
अपने जुड़े के लिए फूल चुना करती है
तेरे मुख पर है किसी प्यार का घूंघट कोई
या कि मेरी तरह ही तुझ पे कोई छांव नहीं
किस कन्हैया कि याद करता है तेरा गोकुल
या कि मेरी तरह तेरा कोई गांव नहीं
तू जो हंसती है तो कैसे कली चटकती है
तू जो गाती है तो कैसे हवाएं थम जातीं
तू जो रोती है तो कैसे उदास होता नभ
तू जो चलती है तो कैसे बहार थर्राती
कुछ भी मालूम नहीं है मुझे कि कौन है तू
तेरे बारे में हरके तरह से अजान हूं मैं
तेरे होठों के निïकट सिर्फ बेजुबान हूं मैं
तेरी दुनियां के लिए सिर्फ बेनिशान हूं मैं
फिर बता तू ही, कहां मुझे पुकारूं जाकर
भेजूं संदेश तुझे कौन सी घटाओं से
किन सितारों में तेरी रात के तारे देखूं
नाम पूछूं तेरा किन सन्दली हवाओं से

                              – गोपाल दास नीरज

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