कोचिंग क्लॉसेज : कितनी आवश्यक

कोचिंग क्लॉसेज की आवश्यकता और उनके महत्व पर आधारित है हमारे इस अंक का यह विशेष लेख. इस विषय पर हमारे प्रतिनिधि परेश शाह ने कई कोचिंग क्लॉसेज, विद्यालयों के शिक्षक एवं विद्यार्थियों से बातचीत की.

सातवीं कक्षा में पढने वाली रौनक स्कूल से दोपहर दो बजे घर आती है. फ्रेश होकर खाना खाकर तीन बजे तक वापस स्कूल बैग लेकर चल देती है. इस बार वह कोचिंग या टयूशन क्लॉसेज जाती है. आजकल जहां प्रत्येक स्कूल अपनी श्रेष्ठता का दावा करता नजर आता है वहीं चारों ओर खुलते कोचिंग क्लॉसेज और उन में जाते हुए विद्यार्थियों की भीड़ उनके महत्व को रेखांकित करती नजर आती है.

मूल रूप से कोटा राजस्थान से संबंधित और सूरत में स्थित शाखा एलन क्लॉसेज के शाखा संचालक संदीप जैन पिछले दो वर्षों से एलन क्लॉसेज से जुडे हुए हैं.वे बताते हैं कि एलन क्लॉसेज छठी कक्षा से बारहवीं कक्षा तक की कोचिंग प्रदान करती है. विद्यार्थियों के विकास में कोचिंग क्लॉसेज किस प्रकार सहायता करते हैं. प्रश्र के उत्तर में संदीप कहते हैं विद्यालय में शिक्षा पाठयक्रम आधारित होती है जबकि बच्चे और उनके अभिभावक विभिन्न व्यवसायिक पाठयक्रमों की प्रवेश परीक्षा की तैयारी भी चाहते हैं जो कि स्कूल में संभव नहीं होती है. साथ ही कोचिंग की एक शाखा में विद्यार्थियों की ज्यादा संख्या भी उनके विकास में बाधक होती है.

एलन में क्लॉसेज टीचिंग के अतिरिक्त लगातार टेस्ट होते हैं जिसके द्वारा विद्यार्थियों को अपनी जांच करने का अवसर मिलता है. साथ ही एलन क्लॉसेज में सुबह आठ बजे से रात आठ बजे तक उनके शिक्षक विद्यार्थियों की समस्या के समाधान के लिए कोचिंग में मौजूद रहते हैं

मुख्य रूप से मुंबई के यूनिवर्सल टयूटोरियल की अडाजन स्थित शाखा के शिक्षक महेश पंडया से बातचीत करने पर वे कहते हैं कि कोचिंग क्लॉसेज विद्यार्थियों के विकास में सहायता के साथ साथ महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाते हैं. स्कूल में शिक्षक सभी विद्यार्थियों को समान रूप से पढ़ाते हैं जबकि सभी विद्यार्थियों की समझने की क्षमता भिन्न होती है. ऐसे में विद्यार्थियों को कोचिंग क्लॉसेज की आवश्यकता होती है. स्कूली शिक्षा के साथ साथ भविष्य की शिक्षा के लिए, व्यवसायिक पाठयक्रमों में प्रवेश की तैयारी के लिए भी कोचिंग क्लॉसेज अहम भूमिका निभाते हैं. यूनिवर्सल टयूटोरियल विद्यार्थियों के विकास के लिए क्या करता है के सवाल के उत्तर में वे कहते हैं कि यहां प्रत्येक विद्यार्थी को प्रत्येक विषय के पाठ को बेसिक से पढाया जाता है. विद्यार्थी का कांसेप्ट पूरी तरह क्लीयर होने तक उसे समझाया जाता है लगातार होने वाली टेस्ट सीरिज और उनके मॉडल आंसर पेपर हमारी कोचिंग की विशेषता है इसके साथ ही हम विद्यार्थी को लगातार प्रोत्सोहित करते हैं.

अडाजन स्थित परफेक्ट कोचिंग क्लॉसेज के डॉ. जयचंद्रन कुट्टी इस बारे में बात करने पर कहते हैं टयूशन और कोचिंग को स्कूल से जो बात अलग करती है वह है माहौल. विद्यार्थी को पाठयक्रम के अतिरिक्त अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के स्तर की शिक्षा का माहौल स्कूल में नहीं मिल पाता है. कोचिंग क्लॉसेज में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के साथ साथ बोर्ड की परीक्षाओं की भी संपूर्ण तैयारी कराई जाती है. इसके अतिरिक्त कई विद्यार्थी ऐसे होते हैं जो समूह में अपनी समस्या पर या सवाल पूछने में झिझक महसूस करते हैं. इस प्रकार कहा जा सकता है कोचिंग क्लॉसेज विद्यार्थी के संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

उज्जवल कोचिंग क्लॉसेज के हिमांशु टेलर के अनुसार एक विद्यार्थी के सही दिशा में विकास के लिए कोचिंग क्लॉसेज अति आवश्यक है. आज बच्चों को सभी चीज जल्दी समझ आनी चाहिए, उन्हें ट्रिक भी जानने की जरूरत महसूस होती है जिसमें कोचिंग काफी हद तक सहायता करते हैं. कोंचिग क्लॉसेज में विद्यार्थी को बिना मारे या सजा दिए बिना शिक्षा दी जाती है. निश्चित पाठयक्रम के अतिरिक्त अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी करवाई जाती है जो कि किसी भी स्कूल में संभव नहीं है.

पर्वत पाटिया स्थित साइनर्जी कोचिंग क्लॉसेज के विकास शर्मा कोचिंग की आवश्यकता के बारे में पूछने पर अपने दोनों मत रखते हुए कहते हैं कि एक मत के अनुसार बच्चे स्कूल और टयूशन के लिए आने जाने से परेशान हो जाते हैं. उनका अधिकांश समय किताबों के बीच गुजर जाता है जबकि आयु का यह समय खेलने कूदने में बिताना चाहिए. परंतु दूसरे मतानुसार और वर्तमान के यर्थाथ के अनुसार कोचिंग क्लॉसेज अतिआवश्यक हैं. वर्तमान में समाज का माहौल प्रतियोगी है. एक एक सीट के लिए गलाकाट स्पर्धा है. विज्ञान वर्ग में मेडिकल और इंजीनियरिंग तथा वाणिज्य वर्ग में दसवीं कक्षा के बाद सीए और सीएस का माहौल है. इस तरह की परीक्षाओं के लिए स्कूल में न तो तैयारी कराई जाती है न ही माहौल है. सिर्फ स्कूल की पढ़ाई पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है. वहां की कमी को कोचिंग क्लॉसेज पूरी करने में मदद करते हैं.

इस सिलसिले में अडाजन स्थित रायन इंटरनेशनल स्कूल के प्रधानाध्यापक शैलेश सुथारिया कहते हैं कोचिंग क्लॉसेज जाना अति आवश्यक तो नहीं है परंतु यदि विद्यार्थी भविष्य में किसी व्यवसायिक पाठयक्रम मेडिकल या इंजीनियरिंग या इसी प्रकार के अन्य पाठयक्रम में प्रवेश के लिए प्रतियोगी परीक्षा देना चाहता है तो उसे कोचिंग क्लॉस में प्रवेश लेना पड़ेगा. विद्यालय में बोर्ड पाठयक्रम और उसकी परीक्षा की तैयारी कराई जाती है प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में कोचिंग क्लॉसेज काफी सहायता करते हैं. वे प्रतियोगी परीक्षाओं से संबंधित सामग्री , संसाधन उपलब्ध कराते हैं और प्रतियोगिता विशेष के पाठयक्रम के अनुरूप तैयारी करने में विद्यार्थी की सहायता करते हैं.

वेसु स्थित अग्रवाल विद्या विहार की सीनियर शिक्षिका सुजाता सिस्टा के अनुसार दसवीं कक्षा तक कोचिंग क्लॉसेज की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं होती है. विद्यार्थी को अपना सौ फीसदी क्लॉस रूम में देना चाहिए. शिक्षक की बातों को ध्यान से सुनना चाहिए. अपनी समस्याओं पर शिक्षक के साथ खुलकर चर्चा करनी चाहिए. वर्तमान में कई स्कूल समय के साथ अपने टीचिंग मैथड बदल रहे हैं वे आधुनिक पद्घतियों का उपयोग शिक्षण में कर रहे हैं. जोकि विद्यार्थियों के लिए फायदेमंद रहते हैं. साथ ही स्कूल विद्यार्थियों के लिए विशेषज्ञ आधारित सेमिनार भी समय समय पर आयोजित करते रहते हैं.

रॉयन इंटरनेशनल स्कूल के विद्यार्थियों के एक समूह से बातचीत करने पर वहां मौजूद विद्यार्थी निधि, राहुल, पंकज, श्वेता, रेशमा, अली, स्वाति और काजल ने जो कि बारहवीं वाणिज्य वर्ग के विद्यार्थी हैं ने अपने विचार इस विषय पर खुलकर हमारे समक्ष रखे. उनके अनुसार वे कोचिंग या टयूशन नहीं जाना चाहते हैं परंतु वे सभी कोचिंग जाते हैं. निधि कहती हैं आधा दिन स्कूल में रहकर हम थक जाते हैं फिर टयूशन कौन जाना चाहेगा ? राहुल बोलते हैं घर वालों की बात को कौन मना कर सकता है जो हम मना करेंगे . श्वेता बताती हैं कोचिंग जाना आजकल का ट्रेंड बन गया है. परिवार वाले सोचते हैं कि आस पास के सभी बच्चे कोचिंग जा रहे हैं तो हमें भी जाना चाहिए. अली कहते हैं उनके परिवार वाले सोचते हैं कि वे कोचिंग नहीं जाएंगे तो उनका भविष्य अच्छा नहीं होगा. श्वाति और रेशमा दोनों को कोचिंग की जरूरत कभी कभी ही लगती है. काजल कहती है जब कोई चीज स्कूल में अच्छे से समझ नहीं आती है तो कोचिंग जरूरी लगती है यानि कि देखा जाए तो दसवीं कक्षा या उससे छोटी कक्षा में बच्चों का कोचिंग जाना एक ट्रेंड की वजïह से है लेकिन बारहवीं या प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग एक आवश्यकता है.

सूरत में प्रत्येक इलाके में ढेरों छोटी बड़ी कोचिंग क्लॉसेज खुली हुई है इनमें से कई सफल हैं तो कई में विद्यार्थी सीमित संख्या में हैं. कोचिंग क्लॉसेज विद्यार्थियों के मानसिक स्तर के अनुरूप प्रत्येक विद्यार्थी पर वैयक्तिक तौर पर ध्यान देकर , लगातार मूल्यांकन पद्घति के द्वारा उसकी सफलता निश्चित करते हैं. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए भी कोचिंग क्लॉसेज एक बेहतर विकल्प के तौर पर उभर कर आ रही हैं.
परेश शाह

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