अलविदा 2017 , कुछ यादगार फिल्मे

अलविदा 2017 ,  
कुछ यादगार  फिल्मे


बाहुबली

स्टोरी प्लॉट:- अमरेंद्र बाहुबली ( प्रभास) और भल्लाल देव (राणा दग्गुबाती) चचेरे भाई हैं, लेकिन दोनों का लालन-पोषण एक ही मां शिवगामी देवी (रमैया कृष्णन) ने किया है। रानी शिवगामी देवी महिष्मति का शासन भी संभालती हैं। शिवकामी भले ही भल्लाल देव की सगी मां है, लेकिन चाहती है कि महिष्मति का राजा अमरेंद्र बाहुबली ही बने जो मां-पिता की मौत के बाद अनाथ हो चुका है। शिवगामी देवी को लगता है कि बाहुबली में अच्छे शासक बनने के सारे गुण हैं। रानी को लगता है कि बाहुबली दयालु है, जबकि उनका अपना बेटा भल्लाल देव निर्दयी है। इसी के बाद कहानी में मोड़ आता है। भल्लाल अपने पिता के साथ मिलकर बाहुबली को उखाड़ फेंकने की साजिश करता है। दोनों इस साजिश में कटप्पा (सत्यराज) और शिवगामी को मोहरे की तरह इस्तेमाल करते हैं।



 न्यूटन 

स्टोरी प्लॉट : न्यूटन कुमार (राजकुमार राव) की अपनी बसाई अलग ही दुनिया है और वह अपनी इसी दुनिया में ही रहना चाहता है। मिडल क्लास फैमिली का न्यूटन कुमार उर्फ नूतन कुमार सरकारी नौकरी में है, लेकिन रिश्वत से कोसों दूर है। टाइम का इतना पक्का है कि डयूटी से पहले आना और काम पूरा करके जाना उसका नियम है। ऐसे में आदर्शवादी न्यूटन को भी लगता है कि वह अपनी कुछ खासियतों के चलते दूसरों से टोटली अलग है। घर वाले उसकी शादी करना चाहते हैं, लेकिन न्यूटन को जब पता चलता है कि लड़की की उम्र अभी 18 साल से कम है तो वह शादी करने से साफ इन्कार कर देता है। दरअसल, स्कूल कॉलेज की दुनिया से निकलने के बाद भी न्यूटन आज भी किताबों में लिखी बातों पर पर चलना पसंद करता है। राज्य में चुनावी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है सो न्यूटन को भी उसकी मर्जी से छत्तीसगढ़ के नक्सली हिंसा से बुरी तरह प्रभावित एरिया में पीठासीन अधिकारी बनाकर भेजा जाता है। दरअसल, छत्तीसगढ़ के इस बेहद पिछड़े इलाके में आज भी माओवादियों का चारों ओर खौफ है और माओवदियों ने इस बार यहां चुनाव का पूरी तरह से बॉयकाट किया हुआ है। वह नहीं चाहते कि यहां किसी भी सूरत में वोटिंग हो। न्यूटन यहां के एक छोटे से गांव के कुल 76 वोटरों से वोटिंग कराने के लिए अपनी टीम के हेलिकॉप्टर से साथ यहां आता है। यहां आने के बाद न्यूटन की टीम में यहीं से थोड़ी दूर एक स्कूल की टीचर माल्को (अंजली पाटिल) भी शामिल है। यहां आने के बाद इनकी टीम की सुरक्षा और वोटिंग कराने की जिम्मेदारी जिस सैनिक बटैलियन की लगती है उसका हेड आत्मा सिंह (पंकज त्रिपाठी) पर है, जिसका मानना है कि यहां वोटिंग कराने से कुछ होने वाला नहीं, सो न्यूटन के साथ बहस होती रहती है। न्यूटन के जोर देने पर आत्मा सिंह अपनी बटैलियन के साथ कैम्प से करीब आठ किमी दूर घने जंगल में एक वीरान पड़े सरकारी स्कूल के एक कमरे में मतदान केंद्र बनाता है और फिर शुरू होता है वोटरों के आने का इंतजार । फिल्म की कहानी शुरू से अंत तक आपको बांधने का दम रखती है। करीब पौने दो घंटे की फिल्म कई बार आपको देश की चुनाव प्रणाली , सरकारी अफसरों की सोच और सिक्यॉरिटी फोर्स के नजरिये के बारे में सोचने पर बाध्य करेगी। न्यूटन एक ऐसी फिल्म है जो दर्शकों की एक खास क्लास के लिए है, जिन्हें रिऐलिटी को स्क्रीन पर देखना पंसद है। वहीं तारीफ करनी होगी यंग डायरेक्टर अमित मसुरकर की जिन्होंने एक कड़वी सच्चाई को बॉलिवुड मसालों से दूर हटकर पेश किया है। यही वजह है कि फिल्म के कई सीन आपको सोचने पर मजबूर करेंगे। ऐसा भी नहीं कि फिल्म बेहद गंभीर सब्जेक्ट पर बनी है और इसमें आपको गुदगुदाने के लिए कुछ नहीं है। पकंज त्रिपाठी और राजकुमार राव के संवादों को सुनकर आप कई बार हंसेंगे। 





लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का   

स्टोरी प्लॉट :  महिलाओं की आकांक्षाओं की कहानी कहती है, फिर चाहे वो किसी भी उम्र, धर्म या समाज की हों.  इस फिल्‍म में एक महिला की पूरी जिंदगी की कहानी चार पात्रों द्वारा कही गयी है जो उम्र के अलग पड़ाव पर हैं. किस तरह यह महिलाये समाज , परिवार और रवायतों की बंदिशों में जकड़ी हुई अपनी आकांक्षाओं का गला घोंट कर उन्हें जीने को मजबूर करती हैं. इस फिल्‍म में रिहाना  बुर्के में कैद, अपने सपनों और चाहतों को परिवार की परंपराओं के बंधनों से आजाद करना चाहती हैं, वहीं दूसरी तरफ लीला एक ब्यूटी पार्लर चलती है, पर उसके सपने भोपाल की तंग गलियों से निकलना चाहते हैं. तीसरी महिला हैं बुआ जी (रत्ना पाठक शाह ) जो की विधवा हैं और उन्हें अकेलेपन से छुटकारा पाने की चाहत है. चौथी महिला है शीरीन ( कोंकणा सेन) जो की कमाल की सेल्स गर्ल हैं. शीरीन तीन बच्चों की मां हैं और उन्हें सिर्फ एक महिला की तरह इस्तेमाल होना नामंजूर है. यह हैं फिल्‍म की चार मुख्‍य किरदार और इन्‍हीं के आसपास घूमती है. इसके अलावा फिल्‍म में एक्‍टर विक्रांत मैसी और  सुशांत सिंह भी नजर आएंगे. अलंकृता श्रीवास्तव की इस फिल्‍म में जेबुनिस्सा बंगेश और मंगेश धाकड़े ने अपना संगीत दिया है और इसके सिनेमेटोग्राफर हैं अक्षय सिंह.






मुक्ति भवन 
स्टोरी प्लॉट:- निर्देशक शुभाशीष भूटियानी की मुक्ति भवनरिश्तों के साथ जिदगी की भी गांठे खोलती है और उनके नए पहलुओं से परिचित कराती है। शुभाशीष भूटियानी ने पिता दया (ललित बहल) और पुत्र राजीव (आदिल हुसैन) के रिश्ते को मृत्युु के संदर्भ में बदलते दिखाया है। उनके बीच राजीव की बेटी सुनीता (पालोमी घोष) की खास उत्प्रेरक भूमिका है। 99 मिनट की यह फिल्म अपनी छोटी यात्रा में ही हमारी संवेदना झकझोरती और मर्म स्पर्श करती है। किरदारों के साथ हम भी बदलते हैं। कुछ दृश्‍यों में चौंकते हैं। दया को लगता है कि उनके अंतिम दिन करीब हैं। परिवार में अकेले पड़ गए दया की इच्छा है कि वे काशी प्रवास करें और वहीं आखिरी सांस लें। उनके इस फैसले से परिवार में किसी की सहमति नहीं है। परिवार की दिनचर्या में उलटफेर हो जाने की संभावना है।
अपनी नौकरी में हमेशा काम पूरा करने के भार से दबे राजीव को छुट्टी लेनी पड़ती है। पिता की इच्छा के मुताबिक वह उनके साथ काशी जाता है। काशी के मुक्ति भवन में उन्हें 15 दिनों का ठिकाना मिलता है। राजीव धीरे-धीरे वहां की दिनचर्या और पिता के सेवा में तत्पर होता है। ऑफिस से निरंतर फोन आते रहते हैं। दायित्व और कर्तव्य के बीच संतुलन बिठाने में राजीव झुंझलाया रहता है। बीच में एक बार पिता की तबियत बिगड़ती है तो राजीव थोड़ा आश्वस्त होता है कि पिता को मुक्ति मिलेगी और वह लौट पाएगा। उनकी तबियत सुधर जाती है। एक वक्त आता है कि वे राजीव को भेज देते हैं और वहां अकेले रहने का फैसला करते हैं।
पिता-पुत्र के संबंधों में आई दूरियों को पोती पाटती है। अपने दादा जी से उसके संबंध मधुर और परस्पर समझदारी के हैं। दादा की प्रेरणा से पोती ने कुछ और फैसले ले लिए हैं, जो एकबारगी राजीव को नागवार गुजरते हैं। बाद में समय बीतने के साथ राजीव उन फैसलों को स्वीकार करने के साथ बेटी और पिता को नए सिरे से समझ पाता है। यह फिल्म परिवार के नाजुक क्षणों में संबंधों को नए रूप में परिभाषित करती है। परिवार के सदस्य एक-दूसरे के करीब आते हैं। रिश्तों के भावार्थ बदल जाते हैं। ललित बहल और आदिल हुसैन ने पिता-पुत्र के किरदार में बगैर नाटकीय हुए संवेदनाओं को जाहिर किया है। दोनों उम्दा कलाकार हैं।
राजीव की बेबसी और लाचारगी को आदिल हुसैन ने खूबसूरती से व्यक्त किया है। छोटी भूमिकाओं में पालोमी घोष और अन्य कलाकार भी योगदान करते हैं। फिल्म में बनारस भी किरदार है। मुक्ति भवन के सदस्यों के रूप में आए कलाकार बनारस के मिजाज को पकड़ते हैं।


हिंदी मीडियम:

स्टोरी प्लॉट:- फिल्म की कहानी चांदनी चौक की मेन बाजार में रेडीमेड गार्मेंट्स का शोरूम चलाने वाले पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में रहने वाले राज बत्रा ( इरफान खान) की है। राज सरकारी स्कूल में हिंदी मीडियम से पढ़ा हुआ है और उसे टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलनी भी आती है। वहीं, अगर उसकी खूबसूरत वाइफ मीता उर्फ मीठू (सबा कमर) की बात करें तो उसे जमकर अंग्रेजी बोलनी आती है। मीता का बस एक ही सपना है कि उसकी इकलौती बेटी पिया बत्रा शहर के टॉप अंग्रेजी मीडियम में स्टडी करे। राज अपनी वाइफ को बहुत चाहता है और अपनी वाइफ के इस सपने को पूरा करने की कोशिश में लग जाता है। राज और मीता अपनी ओर से बहुत कोशिश करते हैं कि उनकी बेटी का ऐडमिशन अंग्रेजी मीडियम स्कूल में हो जाए। अपने इस सपने को पूरा करने के लिए दोनों चांदनी चौक से दूर वसंत विहार रहने के लिए जाते है और कई स्कूलों में पूरी तैयारी के साथ इंटरव्यू देने जाते है। लेकिन उनकी सभी कोशिशें नाकाम हो जाती हैं और तब उन्हें पता चलता है इन टॉप स्कूलों में गरीब कोटे में उनकी बेटी का ऐडमिशन हो सकता है। बस फिर क्या दोनों बेटी को साथ लेकर एक स्लम बस्ती में रहने भी आ जाते हैं। 



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