अधलिखा गीत.


निशा चांदनी की गंध से भरा यौवन आकाश,

हो गई देखो कितनी युवा मेरी सर्जना की प्यास.

मौन के ही जो सगे थे होंठ वे, फिर क्यूं न हो वाचाल,

कुमुदिनी-सा ही खिला होगा, कहीं जब देह का छविताल.

आ जुटेगा फिर सिलसिला, संबोधनों का चुप्पियों के पास,

शब्द तो सब खो गए हैं रह गई केवल कहानी नयनों के पास.

ख्यालों में पास, मेरे आ सटी जब कल्पना सी रातरानी,

रजनीगंधा मन खिल उठा, बन के रहने को नयनों का पानी.

बेचैन मन छूने को अश्रुजल, मछली बनी देह मेरी,

उस जाल के स्पर्श को, उस ताल के स्पर्श को.

अधलिखा वो गीत था, जो मेज पर कल मैंने छोड़ा,

छंद इतंजार का जा सकेगा, अब उसमें नया जोड़ा.

श्वेता गुप्ता.

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