अटल बिहारी वाजपेयी की प्रेरक कविता

२५ दिसंबर २०१४ को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न के लिए जब अटल बिहारी वाजपेयी के नाम को घोषित किया तो सारा देश झूम उठा. पहले गैर कांग्रेसी एवं देश के ग्यारहवें प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी को पूरा भारत जानता है परंतु वे राजनेता के साथ साथ एक कवि भी हैं ये कम ही लोग जानते हैं. कवि हृदय अटलबिहारी वाजपेयी बेहत संवेदनशील व्यक्ति हैं. २००९ में उन्होंने सक्रिय राजनीति से सन्यास ले लिया है. २५ दिसम्बर १९२४ को ग्वालियर मध्यप्रदेश में जन्मे वाजपेयी हिन्दी में कविताएं लिखते हैं.

महक आपके लिए उनकी लिखी हुई एक प्रेरक कविता के संपादित अंश लेकर आई है.

बाधाएं आती हैं आएं,

घिरें प्रलय की घोर घटाएं,

पावों के नीचे अंगारे,

सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं,

निज हाथों से हंसते-हंसते

आग लगा कर जलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा.

हास्य रूदन मेंï, तूफानों में,

अमर असंख्यक बलिदानों में,

उद्यानों में, वीरानों में,

अपमानो में, सम्मानों में,

उन्नत मस्तक, उभरा सीना

पीड़ाओं में पलना होगा.

कदम मिलकर चलना होगा.

उजियारे में, अंधकार में,

कल कछार में, बीच धार में,

घोर घृणा में, पूत ह्रश्वयार में,

क्षणिक जीत में, दीर्घ हार मे,

जीवन के शत शत आकर्षक,

अरमानों को दलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा.

सम्मुख फैला अमर ध्येय पथ,

प्रगति चिरंतन कैसा इति अथ,

सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्ïलथ,

असफल, सफल समान मनोरथ,

सब कुछ देकर कुछ न मांगते,

पावïस बनकर ढलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा.

कुश कांटों से सज्जित जीवन,

प्रखर प्यार से वंचित यौवन

नीरवता से मुखरित मधुवन,

पर हित अर्पित अपना तन मन,

जीवन को शत शत आहुति में,

जलना होगा, गलना होगा.

कदम मिलाकर चलना होगा.

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